मद्रास हाई कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) से कहा है कि वह उस अजीब स्थिति पर विचार करें जिसमें कोई विधायक चुनाव के तुरंत बाद अपने पद से इस्तीफ़ा दे देता है और दूसरी पार्टी से उपचुनाव लड़ता है।

जस्टिस एस.एम. सुब्रमण्यम और जस्टिस कृष्णस्वामी गोविंदराजन की बेंच ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें चुने हुए प्रतिनिधियों की वित्तीय जवाबदेही तय करने के लिए एक सिस्टम बनाने की मांग की गई। ये प्रतिनिधि बिना किसी कानूनी रूप से मान्य और ठोस कारण के अपनी मर्ज़ी से और समय से पहले अपनी सीट से इस्तीफ़ा दे देते हैं।

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचे में इस स्थिति का कोई समाधान नहीं है और ECI से गाइडलाइंस बनाने पर विचार करने को कहा। कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि चुनाव के तुरंत बाद इस्तीफ़ा देने का ऐसा व्यवहार लोकतंत्र का मज़ाक नहीं बनना चाहिए।

बेंच ने मौखिक रूप से टिप्पणी की,

"अभी इस स्थिति के लिए कोई कानून नहीं है। इस बात को लेकर एक खालीपन है कि क्या जनता के जनादेश का सही इस्तेमाल या सही मतलब समझा जा रहा है, या क्या चुने जाने के तुरंत बाद इस्तीफ़ा देने वाले विधायक या सांसद को दोबारा चुनाव लड़ने की इजाज़त दी जा सकती है... ऐसी स्थिति से निपटने के लिए क्या गाइडलाइन है, जिसमें वही विधायक जिसने पद से इस्तीफ़ा दिया, उपचुनाव में फिर से चुनाव लड़ रहा है? यह लोकतंत्र का मज़ाक नहीं होना चाहिए... यह जनता का अपमान करने के अलावा और कुछ नहीं है।"

कोर्ट एडवोकेट सुथन द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में भारत के चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश देने की मांग की गईं कि वे ज़रूरी विधायी/नियामक उपाय शुरू करें ताकि उन विधायकों की वित्तीय जवाबदेही तय करने के लिए एक सिस्टम बनाया जा सके, जो बिना किसी ठोस कारण के चुनाव के तुरंत बाद अपने पद से इस्तीफ़ा दे देते हैं।

याचिकाकर्ता ने उपचुनावों के खर्च की भरपाई के लिए 'चुनाव खर्च सुरक्षा' (Election Expenditure Security) शुरू करने की भी मांग की। साथ ही उन्होंने ज़रूरी विधायी और/या नियामक उपायों की जांच और शुरुआत करने की भी मांग की ताकि कानूनी अयोग्यता या उचित 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' (Cooling-Off Period) लागू किया जा सके। इसका मकसद उन चुने हुए प्रतिनिधियों को एक तय समय तक अगले चुनाव लड़ने से रोकना है जो अपनी मर्ज़ी से और समय से पहले इस्तीफ़ा दे देते हैं।

याचिकाकर्ता ने कहा कि व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों से चुनाव के तुरंत बाद AIADMK विधायकों के इस्तीफ़े के कारण उपचुनाव कराने पड़े, जिससे सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ पड़ा।

याचिकाकर्ता ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचा इस्तीफ़ा देने वाले सदस्य से खर्च की वसूली करने या जनता के जनादेश को छोड़ने के लिए किसी अन्य तरह की जवाबदेही तय करने के मामले में चुप है। उन्होंने इस्तीफ़ा देने वाले MLA से ही चुनाव का खर्च वसूलने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि मदुरंथकम और धारापुरम निर्वाचन क्षेत्रों के AIADMK के पूर्व MLA, जिन्होंने पार्टी छोड़कर TVK जॉइन किया, वे उसी निर्वाचन क्षेत्र से TVK पार्टी की ओर से दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए, उन्होंने मांग की थी कि जब तक उनकी याचिका पर फ़ैसला नहीं हो जाता, तब तक इन दो निर्वाचन क्षेत्रों में उपचुनाव पर रोक लगाने के लिए अंतरिम निर्देश दिए जाएं।

हालांकि, अदालत चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं थी। उसने कहा कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद अदालत उसमें दखल नहीं दे सकती। साथ ही अदालत ने यह भी माना कि इस मुद्दे पर विचार करने की ज़रूरत है और ECI से पूछा कि वह इस संबंध में दिशा-निर्देश क्यों जारी नहीं कर सकती।

उस समय एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने अदालत को बताया कि चीफ जस्टिस एसए धर्माधिकारी और जस्टिस जी अरुल मुरुगा की पहली बेंच ने MLA के इस्तीफ़े से जुड़े मामले की सुनवाई पहले ही कर ली थी और आदेश सुरक्षित रख लिया था।

इस बात पर ध्यान देते हुए अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि मामले को उसी बेंच के सामने रखा जाए और सुनवाई स्थगित की।

Case Title: K Suthan v The Union of India and Others

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