PMLA | BNSS की धारा 223 के तहत संज्ञान लेने से पहले के चरण में ED को आरोपी को वे सभी दस्तावेज देने होंगे, जिन पर वह भरोसा कर रही है: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) के तहत चल रही कार्यवाही में आरोपी को BNSS की धारा 223 के तहत यह कानूनी अधिकार है कि उसे वे सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं, जिन पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) भरोसा कर रहा है। [2026 LiveLaw (Mad) 356]
जस्टिस अब्दुल कुद्दूस और जस्टिस रजनीश पथियिल की बेंच ने कहा कि BNSS की धारा 223 के पहले प्रावधान (Proviso) में बताए गए "सुनवाई का अवसर" (Opportunity of Being Heard) का उद्देश्य निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना, प्रभावी जिरह (Cross-Examination) को संभव बनाना और किसी भी तरह के पूर्वाग्रह (Prejudice) को रोकना है। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों को छिपाने से आरोपी के मामले पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए BNSS 2023 की धारा 223 के पहले प्रावधान में दिए गए 'सुनवाई के अवसर' से यह स्पष्ट होता है कि PMLA कार्यवाही में संज्ञान लेने से पहले के चरण (Pre-Cognizance Stage) में ही आरोपी को उन सभी दस्तावेजों और बयानों की प्रतियां पाने का कानूनी अधिकार है, जिन पर अभियोजन पक्ष (Prosecution) भरोसा कर रहा है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि BNSS की धारा 223(1) का पहला प्रावधान: (a) निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करता है, (b) प्रभावी जिरह को संभव बनाता है, और (c) पूर्वाग्रह को रोकता है। यानी, अभियोजन पक्ष द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों को छिपाने से एक अनुचित स्थिति पैदा होती है और आरोपी के मामले पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे पूरी कार्यवाही ही दूषित हो सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सामान्य आपराधिक कानून (Criminal Jurisprudence) के विपरीत, जहां आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए, PMLA कार्यवाही में जिम्मेदारी (Onus) आरोपी पर आ जाती है। ऐसी स्थिति में कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 223(2) के तहत दिए गए प्रावधान की व्याख्या इस तरह से की जानी चाहिए, जिससे आरोपी को लाभ मिल सके।
अदालत ने कहा,
"जैसा कि ऊपर बताई गई धारा से स्पष्ट है, सामान्य भारतीय आपराधिक कानून के विपरीत - जहां अभियोजन पक्ष को अपराध के हर पहलू को संदेह से परे साबित करना होता है और आरोपी को निर्दोष माना जाता है - PMLA की धारा 24 सबूत पेश करने की जिम्मेदारी (Onus) आरोपी पर डाल देती है। ऐसी स्थिति में BNSS, 2023 की धारा 223(1) के पहले प्रावधान (Proviso) में दिए गए 'अपनी बात रखने का मौका' (Opportunity of Being Heard) वाक्यांश की व्याख्या आरोपी के पक्ष में इस तरह की जानी चाहिए, ताकि PMLA के तहत बेबुनियाद, बदले की भावना से प्रेरित, थोपी गई या परेशान करने वाली शिकायतें दर्ज न की जा सकें।"
अदालत आनंद रामकृष्णन नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने मदुरै के प्रधान जिला एवं सेशंस जज के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें ED को उन दस्तावेजों की प्रतियां देने का निर्देश देने की उनकी अर्जी खारिज कर दी गई, जिन पर ED ने अपना मामला आधारित किया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि निचली अदालत (Trial Court) ने दस्तावेज उपलब्ध न कराने देकर गलती की। उन्होंने कहा कि BNSS की धारा 223(1) का प्रावधान यह स्पष्ट करता है कि ED की शिकायत के साथ दाखिल किए गए दस्तावेज याचिकाकर्ता को दिए जाने चाहिए, क्योंकि आरोपी को अपनी बात रखने का मौका मिलना ही चाहिए।
दूसरी ओर, ED ने तर्क दिया कि 'सरला गुप्ता मामले' में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय किया कि आरोपी को अभियोजन पक्ष द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों की प्रतियां पाने का कानूनी अधिकार केवल 'संज्ञान लेने के बाद' (Post-Cognizance Stage) ही मिलता है।
अदालत ने माना कि अगर निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा जाता है तो यह न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा, क्योंकि इससे उस प्रावधान का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को अपनी बात रखने का जो मौका दिया गया, उसका मतलब यह नहीं है कि 'संज्ञान लेने के चरण' (Cognizance Stage) को मामले के गुण-दोषों की विस्तृत जांच (Roving Inquiry) में बदल दिया जाए।
अदालत ने कहा,
“BNSS ने इस चरण में सुनवाई का अधिकार तो जोड़ा है, लेकिन संज्ञान लेते समय अदालत जो प्रक्रिया अपनाती है, उसके स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया है। दूसरे शब्दों में, इस चरण में केवल यह तय किया जा सकता है कि क्या प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता है और क्या न्यायिक संज्ञान लिया जाना चाहिए। इस चरण में बचाव पक्ष के तर्कों की संभावना की जांच नहीं की जा सकती।”
इस प्रकार, अदालत ने आदेश रद्द किया और ED को निर्देश दिया कि वह 4 सप्ताह के भीतर उन सभी दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराए, जिन पर उसने भरोसा किया।
Case Title : R Anandha Ramakrishnan v The Assistant Director