धार्मिक चिह्न पहने गैर-हिंदू, देवता के प्रति 'श्रद्धा' जताए बिना आगमिक मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक चिह्न पहने हुए गैर-हिंदुओं को तमिलनाडु के आगमिक मंदिरों के परिसर में तब तक प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक कि वे मंदिर द्वारा तय किए गए प्रारूप में एक शपथ-पत्र (अंडरटेकिंग) देकर संबंधित देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त न करें।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाले आगमिक नियम अब संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते, लेकिन जो गैर-हिंदू शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करते, उन पर ये नियम लागू रहेंगे।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अगर इस तरह के प्रवेश की अनुमति दी जाती है तो इससे मंदिर की पवित्रता भंग होगी। हम एक कदम और आगे जाना चाहते हैं। जो गैर-हिंदू अपने धार्मिक चिह्न पहने हुए हैं और जो संबंधित देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त नहीं करते, उन्हें मंदिर परिसर में भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी. मुरुगन की खंडपीठ रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 'तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम, 1947' (Tamil Nadu Temple Entry Authorization Act, 1947) और इसके तहत बने नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जांच की मांग को लेकर दायर की गई। याचिकाकर्ताओं का उद्देश्य ऐसे लोगों को मंदिर के प्रतिबंधित गर्भगृहों में जाने से रोकना था, जो अन्य धर्मों के प्रतीक चिह्न पहने हुए हैं या जो हिंदू धर्म को नहीं मानते।
कोर्ट ने गौर किया कि मद्रास हाईकोर्ट के दो पुराने फैसलों में हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश के मुद्दे पर विचार किया गया। 'कल्याण दास बनाम तमिलनाडु राज्य' (1972) मामले में सिंगल जज ने 'मंदिर प्रवेश प्राधिकरण नियमों' (Temple Entry Authorisation Rules) का नियम 4A रद्द किया था, जो गैर-हिंदुओं को मंदिर परिसर में प्रवेश देने की अनुमति देता था। वहीं, 'डी. सेंथिलकुमार बनाम तमिलनाडु सरकार' (2024) मामले में अन्य सिंगल जज ने मंदिर की परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करने का शपथ-पत्र देने पर प्रवेश की अनुमति दी थी।
कोर्ट ने नियमों के 'गंभीर उल्लंघन' का संज्ञान लिया। इसमें बताया गया कि मदुरै सेंट्रल निर्वाचन क्षेत्र (जहां प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर स्थित है) के एक विधायक ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद मंदिर परिसर में प्रवेश किया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें यह जांचने का अधिकार है कि वहां उचित सुविधाएं दी जा रही हैं या नहीं।
अदालत ने ऐसी प्रथाओं की आलोचना करते हुए कहा:
“…एक माननीय मंत्री, जो ईसाई धर्म को मानते हैं, उन्होंने गैर-हिंदुओं के लिए जरूरी शपथ-पत्र (अंडरटेकिंग) दिए बिना ही तिरुचेंदूर मंदिर में प्रवेश किया... हमारे राजनीतिक कल्चर में 'चाटुकारिता' (चमचागिरी) गहराई तक समाई हुई है। पार्टी कार्यकर्ता अपने नेता को खुश करने के लिए उनके इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं। वे उनके पीछे-पीछे चलने के लिए हमेशा बेताब रहते हैं।”
अदालत ने चाटुकारिता के इस कल्चर पर और टिप्पणी करते हुए कहा:
“लोकतंत्र में सिर्फ चाटुकारिता ही नहीं, बल्कि 'दिखावा' (ऑप्टिक्स) भी मायने रखता है। हम एक ऐसे राजनीतिक नेता को जानते हैं, जो एक गैर-हिंदू धर्म का कट्टर अनुयायी है। लेकिन वह जानबूझकर मंदिर जाता है और अपने माथे पर धार्मिक चिह्न भी प्रमुखता से लगाता है। यह सब सिर्फ लोगों को प्रभावित करने (गैलरी में बैठे दर्शकों को खुश करने) के लिए किया जाता है। ऐसे दिखावे से कितने वोट मिल सकते हैं, यह बात साफ है।”
अदालत ने कहा कि मंदिर की परंपराएं और रीति-रिवाज, चाटुकारिता और दिखावे के आगे नहीं झुक सकते। अदालत ने यह भी कहा कि अब 'आगम' (धार्मिक ग्रंथों) के पुराने नियमों को ज्यों का त्यों नहीं माना जा सकता। संविधान सबसे ऊपर है। ऐसे दकियानूसी धार्मिक नियमों को संविधान के सामने झुकना ही होगा। लेकिन, हम यह भी स्पष्ट कर दें कि ये नियम उन गैर-हिंदुओं पर लागू रहेंगे, जो शपथ-पत्र (अंडरटेकिंग) पर हस्ताक्षर नहीं करते हैं।
इस मामले पर आते हुए अदालत ने कहा कि तमिलनाडु के विभिन्न 'आगम' आधारित मंदिरों के ट्रस्टियों को इन धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए। इसके तहत जो गैर-हिंदू शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करते, उन्हें मंदिर के ध्वज-स्तंभ (फ्लैग-पोल) के आगे जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
इसी आधार पर रिट याचिका स्वीकार की गई।
Case Title: Thangam Venkatesh v. State of Tamil Nadu [W.P.(MD) No. 30452 of 2026]