मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) को सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत मिली छूट का इस्तेमाल भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित जानकारी रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस हेमंत चंदनगौदर ने स्पष्ट किया कि RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत किसी विभाग को छूट दिए जाने के बावजूद, भ्रष्टाचार के आरोपों और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित जानकारी इस छूट के दायरे से बाहर रहती है।

अदालत ने यह भी कहा कि DVAC मैनुअल के नियम 29 के तहत जांच संबंधी जानकारी को गोपनीय बताकर ऐसा अपवाद नहीं बनाया जा सकता, जिसकी अनुमति RTI अधिनियम स्वयं नहीं देता।

हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत अधिकारियों के नाम और अन्य पहचान संबंधी विवरण हटाकर जांच के रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।

क्या था मामला?

एक सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP) ने RTI आवेदन दाखिल कर कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में की गई जांच से संबंधित दस्तावेज मांगे थे। इनमें जांच रिपोर्ट की प्रतियां, सरकार द्वारा उठाए गए सवाल, जांच अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए बयान और जांच के दौरान एकत्र किए गए दस्तावेज शामिल थे।

हालांकि, DVAC के लोक सूचना अधिकारी ने RTI अधिनियम की धारा 8(1)(g) का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। इस प्रावधान के तहत ऐसी जानकारी देने से छूट है, जिसके खुलासे से किसी व्यक्ति की जान या शारीरिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

सेवानिवृत्त अधिकारी की पहली अपील भी खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग में दूसरी अपील दाखिल की। आयोग ने संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट का रुख किया।

DVAC ने क्या दलील दी?

राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि जांच से जुड़े दस्तावेजों का खुलासा करने से गोपनीय सूत्रों और गवाहों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। सरकार ने यह भी कहा कि तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी साझा नहीं की जा सकती और DVAC मैनुअल का नियम 29 जांच संबंधी सूचनाओं को गोपनीय रखने का प्रावधान करता है।

राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि रिकॉर्ड की बड़ी मात्रा होने के कारण उनमें से सभी नाम और पहचान संबंधी विवरण हटाना व्यावहारिक रूप से कठिन होगा।

दूसरी ओर, सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा कि वह स्वयं उस जांच का हिस्सा थे, जिसे अंततः उनके पक्ष में बंद कर दिया गया था। इसलिए उन्हें यह जानने का अधिकार है कि जांच किन तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर की गई।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी गवाह या सूत्र की जान को वास्तविक खतरा होने का कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया और नाम हटाने में होने वाली प्रशासनिक कठिनाई सूचना देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती।

RTI अधिनियम के तहत छूट पर कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस हेमंत चंदनगौदर ने धारा 24(4) के प्रभाव पर विचार करते हुए कहा कि DVAC को सरकारी आदेश के जरिए RTI अधिनियम से छूट दी गई है, लेकिन अधिनियम का प्रावधान स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित जानकारी पर यह छूट लागू नहीं होती।

अदालत ने कहा कि किसी विभाग का आंतरिक प्रशासनिक निर्देश RTI अधिनियम में उपलब्ध छूट के अतिरिक्त कोई नई छूट पैदा नहीं कर सकता।

DVAC मैनुअल के नियम 29 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“जांच के दौरान एकत्र की गई जानकारी को गोपनीय मानने का आंतरिक प्रशासनिक निर्देश ऐसी छूट नहीं बना सकता, जो RTI अधिनियम में मौजूद नहीं है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गोपनीयता का पहलू यह तय करने में प्रासंगिक हो सकता है कि किसी विशेष जानकारी को विश्वास में दिया गया था या नहीं, लेकिन इसके आधार पर जांच के पूरे रिकॉर्ड को रोकना उचित नहीं है।

गवाहों की सुरक्षा के लिए ठोस आधार जरूरी

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ऐसा कोई ठोस सामग्री या सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि संबंधित नामों और विवरणों का खुलासा करने से किसी व्यक्ति की जान या शारीरिक सुरक्षा को खतरा होगा।

कोर्ट के अनुसार, केवल यह सामान्य आशंका जताना कि जानकारी सामने आने से किसी की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, RTI अधिनियम की धारा 8(1)(g) के तहत छूट देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच का हिस्सा होने मात्र से संबंधित अधिकारी को जांच के प्रत्येक दस्तावेज को प्राप्त करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। यदि किसी दस्तावेज में किसी असंबंधित तीसरे पक्ष की वास्तविक निजी जानकारी है, तो उसे सुरक्षित रखा जा सकता है।

हालांकि, राज्य सरकार पूरे रिकॉर्ड को रोकने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी।

राज्य सरकार की याचिका खारिज

इन टिप्पणियों के साथ मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के आदेश को बरकरार रखा और राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी।

अदालत के फैसले का सार यह है कि RTI के तहत विभाग को मिली छूट या जांच रिकॉर्ड की गोपनीयता का हवाला देकर भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारी को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। किसी विशेष जानकारी को रोकने के लिए कानून में निर्धारित छूट और उसके समर्थन में उचित आधार होना आवश्यक है।

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