लंबित आपराधिक मामलों वाले लोग अधिवक्ता बन सकते हैं या नहीं? मद्रास हाईकोर्ट की बड़ी पीठ करेगी फैसला
मद्रास हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न एक बड़ी पीठ (Larger Bench) को संदर्भित किया है कि क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने पर उसे राज्य बार काउंसिल द्वारा अधिवक्ता के रूप में नामांकित (enrol) किया जा सकता है या नहीं।
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस आर. कलैमाथी की खंडपीठ ने यह मुद्दा बड़ी पीठ को भेजते हुए कहा कि अधिवक्ता अधिनियम (Advocates Act) हाईकोर्ट को नामांकन के लिए अतिरिक्त शर्तें लगाने का अधिकार नहीं देता।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यद्यपि हाईकोर्ट की एक पूर्ण पीठ (Full Bench) ने एकल न्यायाधीश के उस निर्देश को स्वीकार किया था जिसमें लंबित आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों के नामांकन पर रोक लगाई गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट विधायिका का कार्य अपने हाथ में नहीं ले सकता और कानून में जो प्रतिबंध मौजूद नहीं हैं, उन्हें न्यायालय नहीं जोड़ सकता।
कोर्ट ने कहा—
“सुप्रीम कोर्ट द्वारा Ashwini Kumar Upadhyay बनाम भारत संघ तथा आर. मुथु कृष्णन मामलों में दिए गए निर्णयों को देखते हुए, S.M. अनंथा मुरुगन मामले में दिए गए निर्देशों पर पुनर्विचार आवश्यक है। चूंकि समकक्ष पीठ और पूर्ण पीठ ने उन निर्देशों को स्वीकार किया है, इसलिए हम उसके विपरीत कोई आदेश पारित नहीं कर सकते। अतः हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष बड़ी पीठ गठित करने हेतु रखें।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एस. भास्करपांडियन द्वारा दायर याचिका से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने वर्ष 1984 में कानून की डिग्री प्राप्त की थी और बाद में ग्राम प्रशासनिक अधिकारी के रूप में सेवा दी। 2014 में सेवानिवृत्ति के बाद जब उन्होंने तमिलनाडु बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन के लिए आवेदन किया, तो उनके खिलाफ दो आपराधिक मामलों के लंबित होने के कारण आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
भास्करपांडियन ने अदालत में कहा कि ये मामले पिछले 10 वर्षों से केवल FIR स्तर पर लंबित हैं और कोई प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि उनका नामांकन S.M. अनंथा मुरुगन बनाम चेयरमैन (2015) के एकल न्यायाधीश के आदेश के कारण रोका गया, जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया गया था कि लंबित आपराधिक मामलों वाले कानून स्नातकों का नामांकन न किया जाए।
हालांकि, बाद में S. मणिकंदन बनाम तमिलनाडु बार काउंसिल मामले में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने कहा था कि मात्र आपराधिक मामले में नाम होना अधिवक्ता बनने से नहीं रोक सकता। जब यह मामला पूर्ण पीठ को भेजा गया, तो पूर्ण पीठ ने एकल न्यायाधीश के दृष्टिकोण को स्वीकार किया, लेकिन यह भी कहा कि यह केवल अस्थायी व्यवस्था है और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को कानून में संशोधन करना चाहिए।
कानूनी पहलू
कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24A में अधिवक्ता बनने के लिए अयोग्यता (disqualifications) पहले से निर्धारित हैं। जब विधायिका ने स्पष्ट रूप से अयोग्यताएं तय कर दी हैं, तो हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत नई अयोग्यताएं नहीं जोड़ सकता।
कोर्ट ने यह भी असहमति जताई कि हाईकोर्ट नियम बनाकर नामांकन की शर्तें तय कर सकता है। उसने कहा कि धारा 34 हाईकोर्ट को ऐसा अधिकार नहीं देती कि वह बार काउंसिल के नामांकन अधिकारों में हस्तक्षेप करे।
इसी कारण, अदालत ने इस पूरे मुद्दे को बड़ी पीठ को सौंपने का निर्णय लिया ताकि कानून की सही स्थिति स्पष्ट की जा सके।