लघु दंड के बाद जांच अवधि लागू करना अवैध, कर्मचारी को पदोन्नति पर विचार का अधिकार: मद्रास हाइकोर्ट
मद्रास हाइकोर्ट की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि लघु दंड की अवधि समाप्त होने के बाद पदोन्नति रोके रखने के लिए तथाकथित जांच अवधि लागू करना अवैध है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड समाप्त होने के बाद कर्मचारी के पदोन्नति पर विचार से उसे वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सी. वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. विजयकुमार की खंडपीठ ने विभाग द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामले की पृष्ठभूमि
संबंधित कर्मचारी विद्यालय शिक्षा विभाग में कार्यरत था। उसके विरुद्ध आरोपपत्र जारी हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उसकी एक वेतनवृद्धि एक वर्ष के लिए स्थगित कर दी गई। जब अप्रैल 1987 में अधीक्षक पद के लिए पदोन्नति सूची तैयार की गई, तब उसका नाम शामिल नहीं किया गया।
बाद में कर्मचारी ने वर्ष 2017 में हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए 01.04.1987 से अधीक्षक पद पर काल्पनिक पदोन्नति और 05.12.1991 से जिला शैक्षिक अधिकारी के निजी सहायक पद पर आगे की पदोन्नति की मांग की। एकलपीठ ने उसकी याचिका स्वीकार की। विभाग ने इसके विरुद्ध अपील दायर की जिसे खंडपीठ ने खारिज कर दिया। इसके बाद विभाग ने पुनर्विचार याचिका दायर की।
विभाग का तर्क था कि वर्ष 1987 की पदोन्नति सूची तैयार करते समय कर्मचारी पर आरोपपत्र लंबित था और दंड अवधि भी प्रभावी थी, इसलिए उसका नाम सूची में शामिल नहीं किया गया। विभाग ने यह भी कहा कि वर्ष 1985 में लगाए गए दंड के आधार पर उसका नाम पदोन्नति से रोका जाना उचित था।
दूसरी ओर कर्मचारी की ओर से कहा गया कि वर्ष 1987 में उसे पदोन्नति से वंचित करने का कोई वैध आधार नहीं था।
अदालत ने पाया कि दिसंबर, 1985 में लगाया गया दंड मार्च 1986 में ही समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद विभाग ने वर्ष 1987 में पदोन्नति से इनकार करते हुए पांच वर्ष की तथाकथित जांच अवधि का हवाला दिया जो विधिसम्मत नहीं है।
अदालत ने 'पुलिस उप महानिरीक्षक एवं अन्य बनाम वी. रानी' मामले के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि दंड की अवधि समाप्त होने के बाद 'जांच अवधि' की अवधारणा अवैध है और इसके आधार पर पदोन्नति पर विचार रोका नहीं जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि एकलपीठ और पूर्व में अपील खारिज करने वाली पीठ ने 01.04.1987 से काल्पनिक पदोन्नति तथा उसके बाद की परिणामी पदोन्नति सही रूप से प्रदान की थी। अभिलेख पर कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं पाई गई। इन टिप्पणियों के साथ विभाग की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई।