मद्रास हाइकोर्ट ने 50 लाख रुपये लेकर जज को रिश्वत देने के आरोप पर जांच के आदेश दिए

Update: 2026-02-14 08:16 GMT

मद्रास हाइकोर्ट जज ने एक मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया, जब ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) ने आरोप लगाया कि एक सीनियर एडवोकेट ने अपने मुवक्किल से 50 लाख रुपये इस बहाने लिए कि यह राशि जज को अनुकूल आदेश पारित कराने के लिए दी जाएगी।

जस्टिस निर्मल कुमार ने मामले की सुनवाई से अलग होते हुए निर्देश दिया कि प्रकरण को चीफ जस्टिस के समक्ष प्रस्तुत किया जाए ताकि इसे उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सके और हाइकोर्ट की सतर्कता शाखा को जांच के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जा सकें।

अदालत ने कहा कि AILAJ चेन्नई द्वारा दिए गए प्रतिवेदन में लगाए गए विशिष्ट आरोपों को देखते हुए यह उचित है कि मामले को सतर्कता शाखा को भेजा जाए। इसलिए अदालत इस मामले की सुनवाई करने के लिए इच्छुक नहीं है। साथ ही चीफ जस्टिस को यह भी उचित निर्देश देने के लिए कहा गया कि इस संबंध में जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाए।

यह मामला एन. गणेश अग्रवाल द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका से संबंधित था, जिसमें उन्होंने CBI मामलों की स्पेशल कोर्ट द्वारा उनकी आरोपमुक्ति याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। उन्होंने अपने विरुद्ध दायर आरोपपत्र को भी रद्द करने की मांग की थी।

अग्रवाल के विरुद्ध आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2008-2009 के दौरान आपराधिक साजिश रचकर मेटल एंड मिनरल्स ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को लगभग 113.38 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया। आरोप है कि उन्होंने भारतीय रुपये और अमेरिकी डॉलर के विदेशी विनिमय उतार-चढ़ाव में सट्टा लगाया और बायर्स क्रेडिट योजना के तहत की गई खरीद के लिए अग्रिम सुरक्षा नहीं ली।

5 फरवरी को जब मामले की आगे सुनवाई होनी थी, तब न्यायालय की रजिस्ट्री को विधि एवं न्याय मंत्रालय, विधि विभाग से एक संप्रेषण प्राप्त हुआ। मंत्रालय ने AILAJ से प्राप्त एक प्रतिवेदन को अग्रेषित किया था।

प्रतिवेदन में आरोप लगाया गया कि एक सीनियर एडवोकेट ने मुवक्किल से 50 लाख रुपये यह कहकर लिए कि यह राशि जज को दी जाएगी। साथ ही कहा गया कि राशि प्राप्त होने के बावजूद कोई आदेश पारित नहीं हुआ। प्रतिवेदन में यह भी कहा गया कि जज या तो उपयुक्त आदेश पारित करें या उचित कार्रवाई प्रारंभ करें।

जब अदालत ने संबंधित सीनियर एडवोकेट से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने आरोपों को पूरी तरह असत्य बताया और कहा कि वह किसी भी प्रकार की जांच में सहयोग करने को तैयार हैं। विशेष लोक अभियोजक ने दलील दी कि ऐसे प्रतिवेदनों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे अदालत की गरिमा प्रभावित होती है।

हालांकि, लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस निर्मल कुमार ने मामले को सतर्कता शाखा को संदर्भित करना उचित समझा और स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया।

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