जाति व्यवस्था पर मद्रास हाईकोर्ट का अहम आदेश- राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सवों में जाति को खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए

Update: 2026-02-20 05:15 GMT

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि हिंदू धार्मिक और चैरिटेबल एंडोमेंट डिपार्टमेंट के ज़रिए राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सव जाति को बनाए नहीं रख सकते।

जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि भारत के रिपब्लिक बनने का मकसद सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना था। कोर्ट ने आगे कहा कि देश में हर अथॉरिटी की कोशिश जाति को खत्म करने की होनी चाहिए, न कि उसे बनाए रखने की। इस तरह कोर्ट ने कहा कि राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सव को इनविटेशन में जाति के नामों का इस्तेमाल करके जाति को बनाए रखने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने कहा,

"जाति एक ऐसी चीज़ है, जो सिर्फ़ लोगों के दिमाग में होती है। भारत के संविधान का आर्टिकल 14, बराबरी के सिद्धांत को बताता है। भारत के रिपब्लिक बनने का मकसद ही सबके साथ एक जैसा बर्ताव करना है, जाति का कॉन्सेप्ट सिर्फ़ जन्म पर आधारित है और सिर्फ़ जन्म ही लोगों को बांटता है। देश में हर अथॉरिटी की कोशिश सिर्फ़ जाति को खत्म करने की होनी चाहिए, न कि उसे बनाए रखने की। अगर कोई त्योहार, जिसमें सरकारी डिपार्टमेंट, यानी एचआर और सीई डिपार्टमेंट भी शामिल है, इस तरह से मनाया जाता है कि जाति का प्रचार हो और अपनी जाति का खास तौर पर प्रचार हो या उस पर गर्व हो, तो इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती।"

कोर्ट एन समरन की एक अर्जी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें एचआर और सीई कमिश्नर, एचआर और सीई के जॉइंट कमिश्नर और अरुलमिगु कंधासामी थिरुकोविल के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर को आने वाले मंदिर त्योहार के इनविटेशन में जाति के नामों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश देने की मांग की गई। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की कि जुलूस के दौरान मूर्ति ले जाने के लिए सिर्फ़ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर द्वारा ऑथराइज़्ड लोगों को ही "श्री पदमथांगिस" के तौर पर हिस्सा लेने की इजाज़त दी जाए।

जब मामला उठाया गया तो राज्य ने कोर्ट को बताया कि मंदिर किसी जाति के नाम का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। हालांकि, राज्य ने बताया कि लोगों के जाति के नाम फेस्टिवल के इनविटेशन में प्रिंट किए गए। राज्य ने कहा कि चूंकि इनविटेशन पहले ही प्रिंट हो चुके थे, इसलिए इस साल के लिए कोई और निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि आने वाले फेस्टिवल से अगर कोई व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी जाति का नाम जोड़ता है तो सिर्फ़ जाति का सफिक्स हटा दिया जाना चाहिए और सिर्फ़ नाम प्रिंट किया जाएगा। कोर्ट ने राज्य की प्रार्थना को भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मामला मंदिर पर छोड़ देना चाहिए।

जुलूस से लोगों को अपॉइंट करने की प्रार्थना के बारे में कोर्ट ने कहा कि वॉलंटियर आमतौर पर मूर्ति ले जाते हैं और इसे आमतौर पर ठीक-ठाक भक्त मौके पर ही मैनेज करते हैं। कोर्ट ने कहा कि जुलूस के लिए नियम बनाना या उसे माइक्रोमैनेज करना पेंडोरा का पिटारा खोल देगा और इसे ज़मीन पर मंदिर को मैनेज करने वाले लोगों पर छोड़ देना चाहिए।

इसलिए कोर्ट मंदिर जुलूस के लिए कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाने के पक्ष में नहीं था।

Case Title: N Samaran v. The Commissioner and Others

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