POCSO मामलों में बच्चे को बार-बार कोर्ट बुलाकर उसका ट्रॉमा दोबारा नहीं जीने दिया जा सकता: मद्रास हाईकोर्ट
यौन शोषण का शिकार हुए बच्चे को क्या सिर्फ आरोपी को पूरा मौका देने के नाम पर बार-बार अदालत बुलाया जा सकता है? इस सवाल पर मद्रास हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा करना बच्चे को दोबारा मानसिक पीड़ा से गुजरने के लिए मजबूर करना होगा, जिसे कानून स्वीकार नहीं कर सकता।
जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है। यदि इस कानून का क्रियान्वयन ही बच्चे के लिए एक और मानसिक आघात का कारण बन जाए, तो यह कानून के उद्देश्य के विपरीत होगा। अदालत ने कहा कि समाज अक्सर यह नहीं समझता कि यौन शोषण का शिकार हुए बच्चे को कितनी गहरी मानसिक पीड़ा होती है और उसे जल्द से जल्द इस आघात से उबरने का अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने कहा कि एक पीड़ित बच्चे को पहले अपने माता-पिता या परिजनों को घटना बतानी पड़ती है, फिर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी, डॉक्टरों, पुलिस, मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 CrPC के तहत बयान देना पड़ता है और अंततः अदालत में गवाही देनी पड़ती है। इन सभी प्रक्रियाओं के दौरान बच्चा बार-बार उसी दर्दनाक घटना को याद करता है, जो अपने आप में एक गंभीर मानसिक आघात है।
मामला एक ऐसे आरोपी की याचिका से जुड़ा था, जिसने विलुप्पुरम की POCSO विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पीड़ित बच्ची को दोबारा बुलाकर जिरह (Cross-examination) करने की उसकी मांग खारिज कर दी गई थी। आरोपी का तर्क था कि मुख्य परीक्षा (Chief Examination) के दिन उसका वकील अदालत में उपस्थित नहीं हो सका, इसलिए उसे जिरह का अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धारा 33(5) विशेष अदालत पर यह जिम्मेदारी डालती है कि बच्चे को बार-बार अदालत में गवाही के लिए न बुलाया जाए। अदालत ने कहा कि आरोपी अन्य गवाहों से जिरह कर सकता है और अपने बचाव में साक्ष्य पेश कर सकता है, लेकिन पीड़ित बच्चे को दोबारा अदालत बुलाकर उसके साथ 'Secondary Victimisation' नहीं की जा सकती।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के नाम पर पीड़ित बच्चे के जीवन और गरिमा के अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता।