मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बार एसोसिएशन और अन्य संबंधित पक्षों से जनहित याचिका (PIL) में शामिल होने को कहा। यह याचिका जबलपुर ज़िला कोर्ट के गेट नंबर 3 और 4 के पास सड़क किनारे सामान बेचने वालों और हाथगाड़ियों (Handcarts) की वजह से होने वाली ट्रैफिक समस्याओं से जुड़ी है।

चीफ़ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीज़न बेंच ने कहा कि इस समस्या का व्यावहारिक समाधान निकालने के लिए संबंधित पक्षों, खासकर वकीलों के संगठन की भागीदारी ज़रूरी होगी।

बेंच ने कहा,

"याचिका में कोर्ट के कामकाज से जुड़ी गतिविधियों, खासकर कोर्ट परिसर में आने-जाने वालों को सेवा देने वाली हाथगाड़ियों के कारण होने वाली ट्रैफिक समस्याओं पर चिंता जताई गई। याचिकाकर्ता खुद जबलपुर ज़िला कोर्ट में वकील हैं। उन्होंने एक अर्ज़ी दाखिल करने की अनुमति मांगी ताकि अन्य संबंधित पक्षों को भी मामले में शामिल किया जा सके, जिनकी भागीदारी इस मुद्दे का व्यावहारिक समाधान निकालने के लिए ज़रूरी होगी।"

इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अन्य संबंधित पक्षों को मामले में शामिल करने के लिए अर्ज़ी दाखिल करने की अनुमति दी और निर्देश दिया कि मामले को दो हफ़्ते बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

यह याचिका नए ज़िला कोर्ट परिसर (जो 2018 में बनकर तैयार हुआ) के गेट नंबर 3 और 4 के सामने सड़क किनारे सामान बेचने वालों और हाथगाड़ियों द्वारा किए गए कथित अतिक्रमण से जुड़ी है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन दुकानों पर आने वाले ग्राहक अपनी गाड़ियां दुकानों के सामने ही खड़ी कर देते हैं, जिससे कोर्ट परिसर की ओर जाने वाली सड़क पर ट्रैफिक में रुकावट आती है।

सुनवाई के दौरान, बेंच ने कहा कि वेंडर कोर्ट आने वाले लोगों की ज़रूरतों को भी पूरा करते हैं और यह बात नोट की:

"आप कैंटीन और बाहर की कीमतों के बारे में जानते हैं। आम जनता वहीं जाना पसंद करेगी। यह उनकी ज़रूरतों को भी पूरा कर रहा है। इसलिए अगर इससे ट्रैफ़िक में दिक्कत होती है तो ज़ाहिर है, इसे ठीक करने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे। स्थिति को ठीक करने के लिए उन्हें हटा देना ही समाधान नहीं है।"

इस मामले में पेश हुए वकील ने कहा कि मुख्य शिकायत यह नहीं थी कि वेंडर जनता को खाना और दूसरी चीज़ें बेच रहे थे, बल्कि यह थी कि जिस तरह से स्टॉल चल रहे थे, उससे ज़िला अदालत जाने वाली सड़क पर जाम लग रहा था।

बेंच ने कहा कि स्थिति से निपटने के लिए एक सही योजना की ज़रूरत है, जिसे ट्रैफ़िक पुलिस या कोर्ट प्रशासन तैयार कर सकता है। हालांकि, बेंच ने यह भी कहा कि ऐसी योजना एकतरफ़ा नहीं हो सकती। इसमें दूसरे स्टेकहोल्डर्स, खासकर वकीलों को भी शामिल होना होगा।

कोर्ट ने कहा,

"ज़ाहिर है, ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए सही योजना की ज़रूरत है, जिस पर ट्रैफ़िक पुलिस या कोर्ट प्रशासन को काम करना चाहिए। लेकिन यह प्रशासन की एकतरफ़ा योजना नहीं हो सकती और इसलिए दूसरे स्टेकहोल्डर्स, मुख्य रूप से वकीलों की भागीदारी की भी उम्मीद है।"

जब वकील ने बताया कि वकीलों का संगठन भी स्टॉल हटाने की कोशिश कर रहा है तो बेंच ने कहा:

"अगर हम हर पहलू को ध्यान में रखकर समाधान चाहते हैं तो बार एसोसिएशन को भी इस मामले में शामिल होना चाहिए।"

बेंच ने आगे साफ़ किया कि वह "इस मामले को विरोधी पक्षों के झगड़े के तौर पर नहीं देख रही है", जिससे यह संकेत मिलता है कि स्टेकहोल्डर्स को मिलकर इस समस्या को सुलझाने की दिशा में काम करना चाहिए।

याचिकाकर्ता का दावा है कि हर दिन लगभग 10,000 लोग, जिनमें वकील और मुक़दमे से जुड़े लोग शामिल हैं, ज़िला अदालत परिसर में आते हैं। यह भी आरोप लगाया गया कि आपराधिक बैकग्राउंड वाले लोग इन दुकानों पर आते हैं और कोर्ट परिसर में आने वाले गवाहों को डराते-धमकाते हैं। याचिकाकर्ता ने पहले कई अधिकारियों को अपनी बात रखी थी, जिनमें हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, ज़िला और सेशंस जज, कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और नगर निगम के कमिश्नर शामिल हैं।

याचिका में कहा गया कि नगर निगम ने मुख्य सड़क के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा करने वालों के लिए एक सार्वजनिक सूचना जारी की थी, लेकिन आरोप है कि वे अपने कब्ज़े या निर्माण को हटाने में नाकाम रहे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अधिकारियों को एक रिमाइंडर भेजा और आरोप लगाया कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

Case Title : Advocate Social And Welfare Association, Jabalpur v State of Madhya Pradesh

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