PIL के अधिकार क्षेत्र में मालिकाना हक और स्वामित्व के सवालों पर फैसला नहीं हो सकता: भोजशाला मंदिर-कमल मौला विवाद में हस्तक्षेप करने वालों ने हाईकोर्ट में कहा
भोजशाला मंदिर-कमल मौला विवाद पर चल रही सुनवाई में इस मामले में दायर PIL में हस्तक्षेप करने वालों ने मंगलवार (28 अप्रैल) को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से कहा कि यह मुद्दा मुख्य रूप से मालिकाना हक और स्वामित्व के सवाल से जुड़ा है। इसलिए इस पर जनहित याचिका (PIL) के ज़रिए फैसला नहीं किया जा सकता।
यह विवाद भोजशाला से जुड़ा है, जो 11वीं सदी का स्मारक है और ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के संरक्षण में है। हिंदू इस जगह को वाग्देवी, यानी देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानते हैं, जबकि मुस्लिम इसे कमल मौला मस्जिद मानते हैं। ASI द्वारा 2003 में किए गए एक समझौते के तहत हिंदू इस परिसर में मंगलवार को पूजा करते हैं, जबकि मुस्लिम शुक्रवार को वहां नमाज़ पढ़ते हैं।
PIL में से एक में इस जगह की वैज्ञानिक जांच की मांग की गई, जिसका मकसद हिंदू समुदाय की ओर से इस जगह को वापस हासिल करना है। इसके अलावा, याचिका में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के परिसर में नमाज़ पढ़ने पर रोक लगाने की भी मांग की गई।
हाईकोर्ट ने इस जगह का सर्वे कराने का आदेश दिया। हालांकि, इस आदेश को धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे की अनुमति देते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह सर्वे रिपोर्ट को खोले, उसकी प्रतियां संबंधित पक्षों को दे और अंतिम सुनवाई के दौरान उनकी आपत्तियों पर विचार करे।
WP नंबर 10497 और 10484/2022 में हस्तक्षेप करने वालों की ओर से पेश होते हुए सीनियर वकील शोभा मेनन ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच के सामने यह दलील दी कि हालांकि PIL का अधिकार क्षेत्र जनहित के मुद्दों को आगे बढ़ाने के लिए शक्तिशाली हथियार के तौर पर विकसित हुआ है, लेकिन अदालतों ने लगातार इस बात की चेतावनी दी है कि इसका इस्तेमाल निजी विवादों को सुलझाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
मेनन ने तर्क दिया,
"PIL याचिकाकर्ताओं के पास जनहित याचिका दायर करने का कोई ठोस कारण नहीं था, जबकि यह स्पष्ट था कि यह मामला एक निजी पक्ष और सरकार के बीच का एक दुखद विवाद है।"
उन्होंने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा विवाद सीधे तौर पर विवादित ढांचे के स्वामित्व को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावों से जुड़ा है। इस पर फैसला सबूतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। स्थापित सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत संक्षिप्त कार्यवाही में स्वामित्व के प्रश्न का निर्धारण नहीं किया जा सकता है। एक रिट अदालत विस्तृत साक्ष्य-आधारित जांच करने के लिए सुसज्जित नहीं है।
मेनन ने तर्क दिया कि ऐसे मुद्दे दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उन्होंने आगे कहा कि धार्मिक प्रथाओं से संबंधित दावों की भी जांच दीवानी कानून के दायरे में ही की जानी चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पूजा का अधिकार दीवानी अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसमें किसी भी कथित हस्तक्षेप से एक दीवानी विवाद उत्पन्न होता है, जिसका समाधान उचित दीवानी कार्यवाही के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।
मेनन ने आगे कहा,
"भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मुकदमों की सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र दीवानी अदालतों के पास है।"
मुकदमे की स्वीकार्यता (Maintainability) के मुद्दे पर मेनन ने तर्क दिया कि वर्तमान कार्यवाही काफी समय बीत जाने के बाद शुरू की गई, क्योंकि पिछली कार्यवाही 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू की गई। अतः, वर्तमान याचिका समान मुद्दों को फिर से उठाने का दोहराया गया प्रयास मात्र है। इसलिए इसमें सद्भावना (bona fide) का अभाव है।
विवादित ढाँचे की स्थिति के संबंध में मेनन ने दलील दी कि यह ASI के नियंत्रण में राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक है, जिसका स्वामित्व और विनियामक अधिकार लागू वैधानिक प्रावधानों के तहत केंद्र सरकार में निहित है। यह तर्क दिया गया कि आधिकारिक रिकॉर्ड इस बात को निर्णायक रूप से स्थापित नहीं करते हैं कि इस स्थल का लगातार धार्मिक उपयोग होता रहा है। साथ ही यह कि इस स्थल को मूल रूप से एक सक्रिय धार्मिक संस्थान के बजाय एक संरक्षित स्मारक के रूप में माना जाता है।
मेनन ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। इसलिए इसे इस तरह से लागू नहीं किया जा सकता, जिससे संरक्षित विरासत स्थलों पर कानूनी या प्रशासनिक नियंत्रण बाधित हो।
मेनन ने तर्क दिया,
"वर्तमान ढाँचा, जो विवाद के घेरे में है, को 1951 के अधिनियम द्वारा संरक्षित घोषित किया गया। उस घोषणा में इसे 'भोजशाला और कमला मस्जिद' के रूप में दर्ज किया गया। उसमें यह उल्लेख नहीं था कि यह संरक्षित स्मारक कोई शैक्षणिक संस्थान है और इसे उसी रूप में माना जाना चाहिए। न ही इसमें यह उल्लेख है कि वर्तमान ढांचे का उपयोग किसी ऐसे संस्थान के रूप में किया जा रहा है, जहां धार्मिक शिक्षा दी जा रही हो, और न ही इसमें यह उल्लेख है कि इस ढांचे के भीतर धार्मिक पूजा-अर्चना की जा रही है। ASI इस इमारत को केवल एक प्राचीन संरक्षित स्मारक मानता है, जिसका राष्ट्रीय महत्व है।"
मेनन ने 1935 की उस अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें इस स्मारक को एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। उन्होंने तर्क दिया कि उस अधिसूचना में इस ढांचे को 'कमला मस्जिद' घोषित किया गया। साथ ही कहीं भी इस ढाँचे को 'सरस्वती मंदिर' के रूप में दर्ज नहीं किया गया।
मेनन ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में वह संविधान लागू होने से पहले इस स्थल की स्थिति पर और तब से लेकर अब तक इस मामले में किस तरह के बदलाव आए हैं, इस पर अपनी दलीलें पेश करेंगी।
पिछली सुनवाई में अदालत ने ASI को निर्देश दिया था कि वह सर्वेक्षण के वीडियोग्राफिक रिकॉर्ड को सुरक्षित डिजिटल पोर्टल पर अपलोड करे, ताकि सभी संबंधित पक्ष (Contesting Parties) उन तक पहुँच बना सकें।
इस मामले की सुनवाई आज (बुधवार) के लिए सूचीबद्ध है।
Case Title: Hindu Front For Justice v Union of India [WP - 10497/2022 (PIL)] and connected matters Antar Singh WP/6514/2013, WP/28334/2019, WP/10484/2022, WA/559/2026