मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के बाद की गई दहेज की मांग पर भी 'दहेज निषेध अधिनियम' की धारा 4 लागू हो सकती है, भले ही शादी से पहले दहेज को लेकर कोई समझौता न हुआ हो। [2026 LiveLaw (MP) 419]

अपीलीय अदालत के उस आदेश को रद्द करते हुए, जिसमें एक पति और उसके पिता को बरी कर दिया गया था, जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा,

"यह एक संस्कृति या परंपरा है कि दहेज अधिनियम की धारा 4 के तहत अपराध के लिए पहले से दहेज का कोई समझौता होना अनिवार्य शर्त नहीं है"... "दहेज" का अर्थ है कोई भी संपत्ति या कीमती वस्तु, जो विवाह के संबंध में, विवाह के समय, उससे पहले या उसके बाद, एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी गई हो या देने का समझौता किया गया हो।

पत्नी ने अपीलीय अदालत के उस फैसले को चुनौती देते हुए अपील दायर की, जिसमें उसके पति और ससुर को क्रूरता (IPC की धारा 498A) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया। इससे पहले, ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था, जिसे अपीलीय अदालत ने पलट दिया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पत्नी के माता-पिता ने शादी के समय लगभग 17 लाख रुपये नकद, गहने और घर का सामान दिया, और शादी का खर्च भी उठाया। हालांकि, ससुराल पहुंचने पर पत्नी को पता चला कि पति ने अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में झूठ बोला था। उसने दावा किया कि उसने अमेरिका से BBA किया है, जबकि असल में उसने केवल 12वीं कक्षा पास की थी और विदेश में कोई पढ़ाई नहीं की थी।

पत्नी के अनुसार, शादी के बाद पति और उसके परिवार वालों ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करना शुरू किया। उनका कहना था कि उन्हें 25 लाख रुपये का दहेज मिलने की उम्मीद थी, लेकिन केवल 17 लाख रुपये ही मिले। जब बाकी दहेज नहीं दिया गया तो उसे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद पत्नी ने 6 अगस्त 2007 को प्रतिवादियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

ट्रायल कोर्ट के सामने अभियोजन पक्ष ने 9 गवाहों से पूछताछ की, जिनमें पत्नी, उसकी मां, भाई, पिता, जांच अधिकारी और पुणे स्थित उसके घर का चौकीदार शामिल थे। वहीं, बचाव पक्ष की ओर से कोई गवाह पेश नहीं किया गया।

रिकॉर्ड की जांच करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने पति और उसके पिता को IPC की धारा 498A और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत दोषी पाया और उन्हें कठोर कारावास (RI) की सजा सुनाई। 1 साल की सजा और ₹1,000 का जुर्माना, जिसका भुगतान न करने पर अतिरिक्त सजा का प्रावधान है।

इससे असंतुष्ट होकर पति और उसके पिता ने अपीलीय अदालत (Appellate Court) में अपील की, जहां दोषसिद्धि (Conviction) को पलट दिया गया और प्रतिवादियों को बरी कर दिया गया।

पत्नी की ओर से सीनियर एडवोकेट ने तर्क दिया कि अपीलीय अदालत ने एक गंभीर भूल की। उन्होंने कहा कि अपीलीय अदालत ने अपना फैसला इस कानूनी आधार पर दिया कि 'यदि शादी से पहले दहेज की कोई तय मांग या समझौता नहीं हुआ, तो शादी के बाद की गई मांग को भी दहेज नहीं माना जा सकता'। सीनियर एडवोकेट ने तर्क दिया कि जिसके पास बहुत पैसा है, वह और अधिक पैसे की मांग कर सकता है, क्योंकि 'लालच की कोई सीमा नहीं होती'।

पति और उसके पिता की ओर से सीनियर एडवोकेट ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) दोनों पक्षों के बीच दहेज को लेकर कोई पूर्व समझौता साबित करने में विफल रहा।

अदालत ने गौर किया कि इस अधिनियम की धारा 2 के तहत दहेज को इस प्रकार परिभाषित किया गया: शादी के संबंध में, शादी के समय, उससे पहले या उसके बाद कभी भी, एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को (या उनके माता-पिता या अन्य लोगों द्वारा) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी गई कोई भी संपत्ति या कीमती वस्तु, जिसे देने का समझौता किया गया हो, दहेज कहलाती है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद की गई दहेज की मांग भी दहेज की परिभाषा के अंतर्गत आती है। पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी मांग को मौखिक गवाही के जरिए साबित किया जा सकता है, और पैसों की मांग को साबित करने के लिए दस्तावेजी सबूत (Documentary Evidence) होना अनिवार्य नहीं है।

अदालत ने आगे कहा कि दहेज की मांग के बारे में पत्नी के बयानों को सभी गवाहों की गवाहियों से काफी हद तक समर्थन मिला। हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि कुछ गवाहों के बयानों में कुछ विवरणों और जानकारी के स्रोतों को लेकर मामूली अंतर है।

हालांकि, पीठ ने माना कि आपराधिक मुकदमे में यह जरूरी नहीं है कि कई गवाह किसी घटना को बिल्कुल एक जैसे शब्दों में दोहराएं। तारीखों, शब्दों या याददाश्त में मामूली अंतर - खासकर तब जब घटना गवाही देने से कई साल पहले घटी हो - का मतलब यह नहीं है कि गवाहों की गवाही अविश्वसनीय हो गई।

अदालत ने गौर किया कि शादी के समय दिए गए कथित 17 लाख रुपये के दहेज के मामले में अपीलीय अदालत का आदेश विरोधाभासी था। पीठ ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि चूंकि पत्नी अपना सामान लेकर पुणे चली गई, इसलिए यह मान लिया जाए कि वह अपनी मर्जी से ससुराल छोड़कर गई।

अदालत ने कहा,

"अगर कोई व्यक्ति झगड़े के बाद अपना सामान समेटकर घर से चला जाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उस झगड़े से पहले उसे परेशान या प्रताड़ित नहीं किया जा रहा है।"

इस प्रकार, पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलीय अदालत साक्ष्य से जुड़ी ऐसी कोई कमी नहीं ढूंढ पाई, जिसके आधार पर निचली अदालत के निष्कर्षों को गलत ठहराया जा सके। अदालत ने माना कि साक्ष्यों से शादी के बाद लगातार दहेज की मांग किए जाने की बात साबित होती है। शिकायतकर्ता की गवाही के साथ-साथ अन्य अभियोजन गवाहों ने भी मुख्य बातों पर इसकी पुष्टि की।

इसके अनुसार, अदालत ने अपीलीय अदालत के बरी करने वाला आदेश रद्द किया और पति को IPC की धारा 498A तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत दोषी ठहराने वाले फैसले को बहाल रखा। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी की मृत्यु के बाद उस पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं रहती, इसलिए पति के पिता के खिलाफ दोषसिद्धि को बहाल नहीं किया गया।

Case Title : DB v State of MP

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