दोहरे दंड के खिलाफ याचिका देरी के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि 'दोहरे दंड' (double jeopardy) के सिद्धांत का हवाला देने वाली याचिकाओं को केवल देरी या सबूत पेश करने की ज़रूरत के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि दोहरे दंड से सुरक्षा एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार है। इसे ट्रायल के दौरान किसी भी समय इस्तेमाल किया जा सकता है।
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की बेंच ने यह टिप्पणी की:
"जब ऐसी कोई याचिका, जिसमें दोहरे दंड के सिद्धांत का हवाला दिया गया हो, दायर की जाती है तो उसे न तो देरी के आधार पर और न ही इस आधार पर खारिज किया जा सकता है कि पक्षों को सबूत पेश करने की ज़रूरत होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि दोहरे दंड के सवाल पर तभी फैसला किया जाना चाहिए जब पक्ष इसे उठाते हैं; अन्यथा, ऐसे कानून का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा - यानी, किसी व्यक्ति को एक ही ट्रायल का दो बार सामना करने की परेशानी से बचाना। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एक ही अपराध के लिए दो बार ट्रायल से सुरक्षा न केवल एक कानूनी अधिकार है, बल्कि एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार भी है, जिसका इस्तेमाल ट्रायल के दौरान किसी भी समय किया जा सकता है।"
यह याचिका 2 सितंबर, 2011 के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई, जिसे फोर्थ एडिशनल सेशन जज ने पारित किया था। इस आदेश में जज ने याचिकाकर्ता की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (criminal revision petition) को देरी के आधार पर खारिज की थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार, मार्च 2005 में प्रोसेस किए गए कई बैंक ड्राफ्ट के संबंध में याचिकाकर्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई। याचिकाकर्ता पर पहले भी धोखाधड़ी (धारा 420), जालसाज़ी (धारा 467), और आपराधिक साज़िश (धारा 120B) के अपराधों के लिए ट्रायल चलाया जा चुका था। याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया गया था और एक साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि पुनरीक्षण न्यायालय (Revisional Court) ने केवल समय-सीमा (limitation) के आधार पर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करके गलती की। न्यायालय ने यह माना था कि CrPC की धारा 300(1) के तहत दायर याचिका चार साल की अवधि बीत जाने के बाद दायर की गई, इसलिए पक्षों को सबूत पेश करने की ज़रूरत होगी।
बता दें, CrPC की धारा 300(1) उस व्यक्ति के बाद के ट्रायल पर रोक लगाती है, जिसका ट्रायल पहले ही किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किया जा चुका हो, जिसे उसी अपराध के लिए या तो दोषी ठहराया गया हो या बरी कर दिया गया हो। याचिकाकर्ता के वकील ने आगे यह तर्क दिया कि इस तरह का आवेदन दायर करना याचिकाकर्ता का कानूनी और संवैधानिक अधिकार था, जिसे समय-सीमा (limitation) के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।
वकील ने आगे यह भी तर्क दिया कि चूंकि बैंक ड्राफ्ट और उस राशि से जुड़ा मामला, जिसके लिए याचिकाकर्ता पर वडोदरा की अदालत में मुकदमा चलाया गया, धार की अदालत के मामले जैसा ही था, इसलिए 'दोहरे दंड' (double jeopardy) के आवेदन को खारिज करने का कोई कारण नहीं था।
अदालत ने यह पाया कि वर्तमान मामले में विचाराधीन बैंक ड्राफ्ट वही ड्राफ्ट थे, जिनके आधार पर वडोदरा में शिकायत दर्ज की गई—सिवाय एक अतिरिक्त ड्राफ्ट के—और इस एक अतिरिक्त ड्राफ्ट से भी अपराध की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता। अदालत ने यह भी पाया कि इस मामले में CrPC की धारा 300(1) और संविधान का अनुच्छेद 20(2) लागू होंगे।
आवेदन दायर करने में हुई देरी के संबंध में अदालत ने यह टिप्पणी की कि 'दोहरे दंड' से मिलने वाली सुरक्षा न केवल एक कानूनी अधिकार है, बल्कि एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार भी है, जिसका प्रयोग मुकदमे की पूरी अवधि के दौरान किसी भी समय किया जा सकता है।
अतः, पीठ ने याचिका स्वीकार की और विवादित आदेश रद्द किया।
Case Title: Harsh v State of Madhya Pradesh, Misc Criminal Case No. 7919 of 2011