हाईकोर्ट ने बढ़ाया 'कम उम्र' में ब्याही दी गई पत्नी का गुजारा भत्ता, कहा- उसे उचित रकम देने से मना नहीं किया जा सकता

Update: 2026-06-02 03:56 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट द्वारा महिला को दिए गए गुज़ारा भत्ते की रकम बढ़ाई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह लड़कियों के अधिकारों की एक दुखद तस्वीर है, जिसमें वह महिला, जो कथित तौर पर बाल विवाह की शिकार है, उसे "बहुत कम गुज़ारा भत्ता" देकर फिर से पीड़ित किया जा रहा है।

महिला की शादी कथित तौर पर 2015 में हुई थी। उस वक्त वह सिर्फ़ 13 साल की थी, उसने आरोप लगाया कि गुज़ारा भत्ता न देकर उसके साथ क्रूरता की गई। उसने यह भी कहा कि उसके पति के पास गुज़ारा करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं और वह खुद अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है। उसने हर महीने ₹10,000 और रहने के लिए ₹2,000 गुज़ारा भत्ते की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने उसकी अर्ज़ी आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसे आदेश की तारीख यानी 19.04.2023 से CrPC की धारा 125 के तहत हर महीने ₹2,000 गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया। इसके ख़िलाफ़ उसने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

जस्टिस गजेंद्र सिंह ने कहा:

"अगर प्रतिवादी/पति के बचाव पक्ष की बातों को सच मान लिया जाए तो यह साफ़ होता है कि याचिकाकर्ता महिला बाल विवाह की शिकार थी। इसके बाद रीति-रिवाजों की आड़ में उसे फिर से बहुत कम गुज़ारा भत्ता देकर पीड़ित किया जा रहा है। यह लड़कियों के अधिकारों की एक दुखद तस्वीर है। उसे गुज़ारा भत्ते की एक उचित रकम देने से मना नहीं किया जा सकता। हर महीने ₹2,000 की रकम को सही नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए इसे बढ़ाने की ज़रूरत है। तदनुसार, याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है और पत्नी के पक्ष में दी गई रकम को आवेदन की तारीख यानी 07.08.2021 से हर महीने ₹2,000 से बढ़ाकर ₹6,000 कर दिया जाता है।

जो माता-पिता ऐसी शादी करवाने में अहम भूमिका निभाते हैं, वे अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते। अगर पति को कोई मुश्किल पेश आती है तो उसे उन माता-पिता से मदद लेनी चाहिए, जिन्होंने बाल विवाह करवाने में भूमिका निभाई थी।"

महिला ने कोर्ट का दरवाज़ा इसलिए खटखटाया था, क्योंकि वह फैमिली कोर्ट के उस आदेश से असंतुष्ट थी, जिसमें CrPC की धारा 125 के तहत उसकी गुज़ारा भत्ते की अर्ज़ी को आंशिक रूप से ही स्वीकार किया गया था। पति ने दावा किया कि शादी के समय वह 18 साल का था और पत्नी सिर्फ़ 13 साल की थी। उसने आगे दावा किया कि दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं बने, इसलिए क्रूरता के आरोप झूठे हैं।

पति ने आगे यह भी कहा कि पत्नी के पास उसका 'स्त्रीधन' मौजूद है और वह उसके साथ वैवाहिक जीवन बिताने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती।

इसलिए बेंच ने भरण-पोषण की राशि बढ़ाकर ₹6,000 की और उसकी 'आपराधिक पुनरीक्षण याचिका' (Criminal Revision) मंज़ूर की।

Case Title: R v H, CRR-2566-2023

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