समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: एनएच प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-06-03 15:28 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहित की गई, लेकिन मुआवज़े की रकम जारी नहीं की गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि ज़मीन मालिकों को समय पर मुआवज़ा दिए बिना उनकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की:

"अधिग्रहित ज़मीन के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार सिर्फ़ एक कानूनी हक नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 300-A से मिलने वाली एक संवैधानिक गारंटी है। समय पर मुआवज़ा दिए बिना संपत्ति से वंचित करना सत्ता का मनमाना इस्तेमाल माना जाएगा और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। आपसी सहमति से छूटी हुई ज़मीनों के अधिग्रहण से जुड़ी नीति में ही यह प्रावधान है कि देरी और विवादों से बचने के लिए अधिग्रहण तेज़ी से किया जाए और तुरंत भुगतान किया जाए। अगर ज़मीन मालिक, अधिग्रहण के लिए सहमति देने के बाद मुआवज़े के लिए अनिश्चित काल तक इंतज़ार करने पर मजबूर होते हैं तो ऐसी नीति का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।"

एक रिट याचिका दायर की गई, जिसमें 'रिट ऑफ़ मैंडमस' जारी करने की मांग की गई। इस रिट के ज़रिए राज्य सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह नेशनल हाईवे के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहण के बदले याचिकाकर्ताओं के पक्ष में तय की गई मुआवज़े की रकम को जारी करे और वितरित करे।

याचिकाकर्ताओं की ज़मीनें शहडोल ज़िले में हैं। शुरुआत में, उमरिया को शहडोल से जोड़ने वाले हाईवे के निर्माण के लिए किए गए बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण में इन ज़मीनों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में अधिकारियों को पता चला कि प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए याचिकाकर्ताओं की ज़मीनों की ज़रूरत है। इसलिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने 15 मार्च, 2016 को एक सर्कुलर जारी किया। इस सर्कुलर में विशेष रूप से यह प्रावधान किया गया कि देरी से बचने के लिए छूटी हुई ज़मीनों का अधिग्रहण आपसी सहमति से किया जाए।

तदनुसार, ज़मीन अधिग्रहण के लिए याचिकाकर्ताओं को ₹3.35 करोड़ की राशि मंज़ूर की गई। रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि प्रस्ताव और उसके साथ मंज़ूर की गई राशि, 2 जनवरी, 2026 को भुगतान जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेज दी गई।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने संबंधित प्राधिकारी को बार-बार अभ्यावेदन (Representations) दिए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह तर्क दिया कि मुआवज़े की रकम को रोककर रखने का प्रतिवादियों का पूरा कृत्य संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को अधिग्रहित ज़मीनों के लिए मुआवज़ा पाने का अधिकार है, क्योंकि यह संपत्ति के अधिकार का एक अहम पहलू है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत आता है।

प्रतिवादियों की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि मुआवज़े की राशि जारी करने में देरी, भुगतान प्रक्रिया से जुड़ी प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक ज़रूरतों के कारण हुई।

दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की ज़मीन एक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित की गई और यह अधिग्रहण 15 मार्च, 2016 के सर्कुलर के अनुसार, आपसी सहमति की नीति के तहत किया गया था। खंडपीठ ने आगे कहा कि प्राधिकरण ने मुआवज़े की राशि ₹3.35 करोड़ तय की थी। इसलिए विचार के लिए केवल एक ही मुद्दा बचा था: प्रतिवादियों द्वारा उक्त राशि का भुगतान न करना।

अदालत ने प्रशासनिक देरी के संबंध में प्रतिवादी की दलील खारिज की।

खंडपीठ ने ज़ोर देकर कहा,

"एक बार अधिग्रहण पूरा हो जाने और मुआवज़ा तय हो जाने के बाद प्रतिवादियों का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे तत्काल भुगतान सुनिश्चित करें। भुगतान में किसी भी तरह की देरी, वैधानिक योजना के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है और ज़मीन मालिकों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।"

खंडपीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मुआवज़ा पाने का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A से प्राप्त होती है। खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि समय पर मुआवज़ा दिए बिना याचिकाकर्ता को उसकी संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है; क्योंकि यह नीति स्वयं ही देरी और विवादों से बचने के लिए त्वरित अधिग्रहण और तत्काल भुगतान की परिकल्पना करती है।

इस प्रकार, अदालत ने कहा,

"एक बार जब प्रतिवादियों ने स्वयं ही मुआवज़े की राशि तय कर ली है और भुगतान का प्रस्ताव आगे बढ़ा दिया है तो उस राशि को रोकने का कोई भी औचित्य नहीं बचता। प्रशासनिक अक्षमताओं या प्रक्रियात्मक देरी को याचिकाकर्ताओं के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

इसलिए खंडपीठ ने याचिका स्वीकार की और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे 8 सप्ताह की अवधि के भीतर मुआवज़े की राशि जारी करने और वितरित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं।

Case Title: Shanti Singh v State of Madhya Pradesh, WP-15538-2026

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