मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एमपी पब्लिक सर्विसेज़ (रिज़र्वेशन) अमेंडमेंट एक्ट, 2019 को रद्द किया। इस एक्ट में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 27% और EWS उम्मीदवारों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान था। [2026 LiveLaw (MP) 411]

उच्च शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े डेटा की जांच करने के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीज़न बेंच ने पाया कि OBC कैटेगरी को "संविधान के अनुच्छेद 16(3) के अनुसार पर्याप्त प्रतिनिधित्व" मिला हुआ है और निर्देश दिया:

"संशोधन अधिनियम, 2019 को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ताओं की सभी रिट याचिकाएं स्वीकार की जाती हैं। संशोधन अधिनियम, 2019 को रद्द किया जाता है। OBC के लिए अतिरिक्त आरक्षण, EWS आरक्षण और हॉरिजॉन्टल रिज़र्वेशन आदि के लिए दायर बाकी याचिकाओं को इस आदेश के मद्देनजर खारिज माना जाएगा।"

हाईकोर्ट में कई रिट याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें एमपी ऑर्डिनेंस 2 (2019) और एमपी लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2019 [एमपी पब्लिक सर्विसेज़ (रिज़र्वेशन) अमेंडमेंट एक्ट, 2019] को चुनौती दी गई थी।

ये याचिकाएं MBBS छात्रों के एक समूह ने दायर की थीं, जो सभी जनरल कैटेगरी के थे और 2019 की NEET PG परीक्षा के उम्मीदवार थे। तर्क दिया गया कि कई याचिकाकर्ताओं ने अच्छे अंकों के साथ परीक्षा पास की थी और उन्हें काउंसलिंग के लिए बुलाया गया। काउंसलिंग के दौरान ही सरकार ने विवादित ऑर्डिनेंस लागू किया और OBC कैटेगरी का आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया। बाद में एक संशोधन भी पारित किया गया।

कोर्ट ने एमपी राज्य में OBC के प्रतिनिधित्व की जांच की। कोर्ट ने देखा कि 2003 से राज्य में OBC समुदाय से 4 मुख्यमंत्री रहे हैं और 25% से ज़्यादा मंत्री या विधायक इसी समुदाय से हैं।

इसके अलावा, 2023 के शिक्षा डेटा के अनुसार, उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाले छात्रों में OBC छात्रों की हिस्सेदारी 33.87% है।

आरक्षित कोटे के साथ इस बात पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा,

"OBC उम्मीदवार ओपन कॉम्पिटिशन (खुली प्रतियोगिता) वाली सीटों में से लगभग 50% सीटें हासिल कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश राज्य में SC, ST, OBC और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए कुल 60% सीटें आरक्षित हैं, जिससे ओपन कैटेगरी के लिए 40% सीटें बचती हैं। डेटा से पता चलता है कि OBC उम्मीदवार अपने आरक्षण कोटे से 14% सीटें और ओपन कॉम्पिटिशन से बाकी 20% सीटें हासिल कर रहे हैं।"

कोर्ट ने BRAUSS रिपोर्ट की 2023 की एक और स्टडी का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि 23.91% OBC लोगों ने ग्रेजुएट या उससे ऊपर की डिग्री हासिल की। राज्य की कुल आबादी का 4.4% हिस्सा ग्रेजुएट है।

इसके अलावा, उच्च शिक्षा विभाग की एक स्टडी के अनुसार, OBC वर्ग में उच्च शिक्षा में कुल दाखिले 45% से बढ़कर 60% हो गए।

साथ ही बेंच ने सामाजिक स्थिति, रोज़गार की स्थिति और आर्थिक स्थिति पर की गई स्टडीज़ की भी समीक्षा की।

कोर्ट ने यह भी देखा कि पब्लिक सर्विस (सरकारी सेवाओं) के डेटा के अनुसार, OBC उम्मीदवार आरक्षण के ज़रिए 14% सीटें और कभी-कभी ओपन कॉम्पिटिशन से 15-20% सीटें हासिल कर रहे हैं। जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए केवल 20-25% सीटें ही बचती हैं, क्योंकि आमतौर पर 70% सीटें SC, ST और OBC कैटेगरी के उम्मीदवारों से भरी होती हैं।

यह देखते हुए कि इस मामले में आरक्षण का होना मुख्य मुद्दा नहीं है, कोर्ट ने कहा,

"असली मुद्दा आरक्षण का दायरा है। अगर आरक्षण का दायरा बहुत ज़्यादा है, तो यह आर्टिकल 16(1) के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। जैसा कि ऊपर बताया गया, आरक्षण का दायरा हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा। पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व की कमी, राज्य सरकारों के लिए सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने के ठोस कारण हैं, न कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर। इसलिए अगर किसी मामले में कोर्ट को राज्य के कानून के तहत ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिनिधित्व मिलता है, तो ऐसे कानून को रद्द किया जा सकता है, क्योंकि यह संवैधानिक ज़रूरतों का उल्लंघन होगा।"

इसके बाद, बेंच ने याचिकाओं का निपटारा किया।

Case Title : Ashita Dubey v State of MP

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