सिर्फ़ कई FIR होना ही BNS के तहत 'संगठित अपराध' का आरोप लगाने के लिए काफ़ी नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ सिर्फ़ कई मामले होना ही BNS की धारा 111(4) के तहत संगठित अपराध का आरोप लगाने के लिए काफ़ी नहीं है, क्योंकि "कुछ बुनियादी मापदंड" हैं, जिन्हें यह आरोप लगाने से पहले पूरा करना ज़रूरी है।
जस्टिस गजेंद्र सिंह ऐसे मामले पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें कोर्ट ने पहले राज्य से यह बताने को कहा था कि इस मामले में धारा 111 (संगठित अपराध) कैसे लागू होती है।
कोर्ट ने पाया कि राज्य ने धारा 111 लगाने को इस आधार पर सही ठहराया कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में कई मामले दर्ज है, जिनमें से एक महाराष्ट्र के ठाणे ज़िले में, दूसरा तेलंगाना के साइबराबाद ज़िले में, तीसरा भी तेलंगाना में साइबर क्राइम पुलिस के पास और चौथा पंजाब के जालंधर ज़िले में है।
हालांकि, कोर्ट ने कहा:
"इस आदेश के पैरा नंबर 13, 14 और 15 में अभियोजन पक्ष द्वारा BNS, 2023 की धारा 111(4) लगाने के लिए बताए गए कारण ज़्यादा-से-ज़्यादा बस यही दिखाते हैं कि दर्ज की गई शिकायतें या अपराध अभी जांच के दायरे में हैं। वे इस आदेश के पैरा नंबर 12 के सब-पैरा नंबर 17 के मानकों को पूरा नहीं करते हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ BNS, 2023 की धारा 111(4) के तहत आरोप तय करने में गलती की। अगर अभियोजन पक्ष याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ BNS, 2023 की धारा 111 लगाने को सही ठहराने के लिए काफ़ी सबूत इकट्ठा कर लेता है तो उन्हें आगे की जांच और पूरक अंतिम रिपोर्ट (Supplementary Final Report) दाख़िल करके कोर्ट के सामने पेश किया जा सकता है। साथ ही अतिरिक्त आरोप लगाने की गुज़ारिश की जा सकती है। फ़िलहाल, याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ BNS, 2023 की धारा 111(4) के तहत लगाए गए आरोप टिकने लायक नहीं हैं।"
कोर्ट ने आगे कहा कि धारा 111 लाने का मुख्य मकसद संगठित अपराध सिंडिकेट को खत्म करने के लिए लक्षित और असरदार तंत्र उपलब्ध कराना है। इसमें कहा गया है कि धारा 111 लागू करने के लिए कुछ बुनियादी मापदंड हैं। यदि यह पाया जाता है कि आरोपी इन मापदंडों के दायरे में आता है, तभी BNS, 2023 की धारा 111 के तहत दंडनीय अपराध लागू किया जा सकता है।
ये मापदंड इस प्रकार हैं:
(1) धारा में सूचीबद्ध अपराध किए गए हों।
(2) आरोपी किसी संगठित अपराध सिंडिकेट का सदस्य होना चाहिए।
(3) उसने किसी संगठित अपराध सिंडिकेट के सदस्य के रूप में, या ऐसे सिंडिकेट की ओर से अपराध किया हो।
(4) पिछले दस वर्षों के भीतर किसी सक्षम न्यायालय के समक्ष, तीन वर्ष या उससे अधिक की कारावास की सज़ा वाले संज्ञेय अपराध के लिए, उसके विरुद्ध एक से अधिक बार आरोप-पत्र (chargesheet) दाखिल किया गया हो; और जिस न्यायालय के समक्ष आरोप-पत्र दाखिल किया गया, उसने उस अपराध का संज्ञान लिया हो (इसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हैं)।
(5) अपराध हिंसा, डराने-धमकाने, धमकी, ज़बरदस्ती या किसी अन्य गैर-कानूनी तरीके का इस्तेमाल करके किया गया हो।
यह मामला 30 अक्टूबर, 2024 को अमित नाम के एक व्यक्ति की शिकायत से शुरू हुआ। शिकायत में आरोप लगाया गया कि "USB Securities" नाम के WhatsApp ग्रुप के सदस्यों ने याचिकाकर्ता से संपर्क किया और उसे मुनाफ़े का वादा करके शेयर बाज़ार में निवेश करने के लिए उकसाया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने अलग-अलग खातों में ₹26.55 लाख ट्रांसफ़र कर दिए।
विनय यादव, राहुल यादव और हेरलाल समेत कुछ अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की गई और सह-आरोपियों के ख़िलाफ़ जांच को लंबित रखा गया। इसके बाद आरोप तय किए गए। याचिकाकर्ता ने आरोप तय किए जाने को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। उसने दलील दी कि आरोप केवल अटकलों और अंदाज़ों पर आधारित है और ट्रायल कोर्ट उसके संबंध में सबूतों की जांच करने के अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने में नाकाम रही।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता और अन्य सह-आरोपियों के बीच न तो कोई कॉल रिकॉर्ड मौजूद है और न ही कोई ऐसा सामान ज़ब्त किया गया, जिससे उन पर आरोप साबित होते हों। आगे यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता लॉ ग्रेजुएट है और उसके ख़िलाफ़ दर्ज यह पहला अपराध है। इसलिए धारा 111(4) के तहत लगाया गया आरोप उस पर लागू नहीं होता।
जांच की फाइनल रिपोर्ट की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता 2023 में राहुल और विनय के संपर्क में आया था। उससे ₹1 लाख के भुगतान के बदले बैंक अकाउंट उपलब्ध कराने के लिए कहा गया। बाद में याचिकाकर्ता ने बैंक अकाउंट्स हासिल करने के लिए राहुल यादव से संपर्क किया। उसे प्रति बैंक खाता ₹5,000 का भुगतान किया। इस तरह राहुल यादव ने याचिकाकर्ता को 4 बैंक अकाउंट उपलब्ध कराए, जिन्हें याचिकाकर्ता ने आगे विजय मेवाड़ा को दे दिया।
अदालत ने यह भी पाया कि ये सभी लोग अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए एक-दूसरे के संपर्क में थे और वे नियमित रूप से अपनी चैट हिस्ट्री (बातचीत का ब्योरा) मिटाते रहते थे। इसलिए बेंच ने यह माना कि BNS, 2023 की धारा 3(5) (साझा इरादा) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 318(4) (धोखाधड़ी) और 316(5) (आपराधिक विश्वास भंग) के तहत आरोप तय करने के लिए रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद थे।
अदालत ने आमिर बशीर मग्रे बनाम राज्य (2025 SCC OnLine J&K 721) मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि इस धारा के तहत दायित्व के लिए यह दिखाना ज़रूरी है कि व्यक्ति लगातार गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल था—जिसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हो सकते हैं—और यह कि पिछले 10 वर्षों में किसी सक्षम अदालत द्वारा उस व्यक्ति के खिलाफ एक से अधिक बार चार्जशीट दायर की गई हो।
अदालत ने यह पाया कि मौजूदा मामले में यह बात लागू नहीं होती।
इस प्रकार, बेंच ने पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की और BNS की धारा 111(4) के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द किया।
Case Title: Hiralal v State of Madhya Pradesh, CRR-3881-2025