ज़मीन मालिकों की बेटियों से 'शादी' करके हासिल की नौकरियां: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दिया जांच का आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने South Eastern Coalfields Limited (Coal India की सहायक कंपनी) की ज़मीन अधिग्रहण पुनर्वास योजना के तहत हासिल की गई नियुक्तियों की जांच का आदेश दिया। कोर्ट ने पाया कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर आदिवासी ज़मीन मालिकों (जिन्हें ज़मीन अधिग्रहण के बदले नौकरी पाने का अधिकार था) की बेटियों से शादी करके नौकरी हासिल की, और नौकरी मिलने के बाद शादी तोड़ दी।
जस्टिस मनिंदर एस. भट्टी की बेंच ने टिप्पणी की कि ज़मीन उन लोगों की थी, जो आदिवासी होने के साथ-साथ अनपढ़ भी थे और कुछ चालाक लोगों ने उन्हें नौकरी दिलाने का लालच दिया।
"ज़मीन मालिकों को मुआवज़ा दिया गया। मुआवज़े के अलावा, नीति में ज़मीन अधिग्रहण के बदले नौकरी देने का भी प्रावधान था। नीति के इन प्रावधानों का कुछ लोगों ने गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने ज़मीन मालिक की बेटी से शादी का दिखावा किया और नौकरी मिलने के बाद उन शादियों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। बाद में जिन लोगों को नौकरी मिली, उन्होंने कहीं और शादी कर ली।"
कोर्ट ने कहा कि नौकरी पाने वाले लोगों के ऐसे कामों ने असल हकदार, यानी ज़मीन मालिक या उनके सीधे आश्रितों को उनके अधिकार से वंचित किया।
इसलिए कोर्ट ने यह निर्देश दिया:
"ऐसी सभी नियुक्तियों के संबंध में एक जांच की जाए। इस जांच में सभी संबंधित पक्षों—जिन लोगों को नौकरी मिली, ज़मीन मालिक और उनकी बेटियां (जिनसे शादी को नौकरी पाने का आधार बनाया गया)—को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाए।"
जांच पूरी होने के बाद अगर यह पाया जाता है कि शादी सिर्फ पुनर्वास योजना के तहत रोज़गार पाने के लिए की गई तो प्रतिवादियों को ऐसे लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की पूरी आज़ादी होगी।
यह याचिका साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के जनरल मैनेजर द्वारा पारित आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई, जिसके तहत एक बड़ी सज़ा दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता को क्लर्क ग्रेड II से क्लर्क ग्रेड III में पदावनत कर दिया गया।
याचिकाकर्ता को नवंबर, 1985 में कंपनी में लोडर के पद पर नियुक्त किया गया। 1991 में क्लर्क ग्रेड III और 1995 में क्लर्क ग्रेड II के पद पर पदोन्नत किया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसने 1984 में मीरा बाई से शादी की और 1986 में आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार उसे तलाक़ दे दिया। उसके बाद उसने सरला सिंह से दूसरी शादी की और इस शादी के बारे में अपने नियोक्ता को सूचित किया। सरला सिंह की मृत्यु के बाद उसने विद्यावती सिंह से शादी की और इस शादी के बारे में भी अपने नियोक्ता को विधिवत सूचित किया।
हालांकि, अक्टूबर 2005 में याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप-पत्र जारी किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसने मीरा बाई के साथ अपनी पहली शादी को कानूनी रूप से समाप्त किए बिना दूसरी शादी करके द्विविवाह (Bigamy) का अपराध किया। इस तरह उसने प्रमाणित स्थायी आदेशों (Certified Standing Orders) के खंड 26.20 का उल्लंघन किया।
याचिकाकर्ता ने आरोप-पत्र का जवाब दिया, लेकिन उसे असंतोषजनक पाया गया। परिणामस्वरूप, एक विभागीय जांच शुरू की गई, जिसके बाद उस पर बड़ी सज़ा लगाई गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन उसकी याचिका खारिज की गई और कंपनी को निर्देश दिया गया कि वह उसके अभ्यावेदन (Representation) पर विचार करे।
इसके बाद कंपनी ने उस अभ्यावेदन को भी खारिज किया, जिसके चलते यह वर्तमान रिट याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता के सीनियर वकील ने यह तर्क दिया कि एकमात्र आरोप यह था कि याचिकाकर्ता ने अपनी पहली शादी के कायम रहते हुए दूसरी शादी करने से पहले प्रबंधन से पूर्व अनुमति नहीं ली थी।
सीनियर वकील ने आगे यह तर्क दिया कि जांच अधिकारी ने यह मान लिया कि आरोप सिद्ध हो गया, जबकि उसने पहली पत्नी की गवाही पर ठीक से विचार नहीं किया था; पहली पत्नी ने अपने आदिवासी समुदाय में प्रचलित अलगाव और तलाक़ की प्रथाओं के बारे में गवाही दी थी।
दूसरी ओर, कंपनी के वकील ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को नौकरी इसलिए मिली थी, क्योंकि वह उस ज़मीन मालिक का दामाद था, जिसकी ज़मीन कंपनी ने अधिग्रहित की थी और अधिग्रहण के बदले उसे नौकरी दी गई।
कंपनी के वकील ने तर्क दिया कि नीति के तहत ज़मीन मालिक के सीधे तौर पर आश्रित व्यक्ति को ही नौकरी दी जा सकती थी, और नीति के अनुसार याचिकाकर्ता को एक आश्रित के तौर पर ही माना गया।
जांच रिपोर्ट की समीक्षा करते हुए अदालत ने यह पाया कि कंपनी से पहले अनुमति लिए बिना याचिकाकर्ता द्वारा की गई दूसरी शादी का सीधा संबंध 'स्टैंडिंग ऑर्डर्स' (स्थायी आदेशों) के नियम 26.20 से था। अदालत ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता स्वयं ज़मीन मालिक नहीं था, और उसे नौकरी केवल इसलिए मिली, क्योंकि वह ज़मीन मालिक का दामाद है।
अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी दस्तावेज़ या सबूत मौजूद नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने मीरा बाई के साथ अपने विवाह के टूट जाने के बारे में कंपनी को सूचित किया, या दूसरी शादी करने से पहले कंपनी से अनुमति मांगी थी।
याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए पीठ ने यह फैसला सुनाया:
"अतः, उपरोक्त विश्लेषण को देखते हुए यह स्पष्ट है कि यह एक ऐसा मामला है, जिसमें याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से साबित हो चुके हैं। इसलिए इस अदालत की यह राय है कि याचिका खारिज की जानी चाहिए, क्योंकि विवादित आदेश में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।"
पीठ ने उन पुनर्वास योजनाओं के कथित दुरुपयोग पर भी चिंता व्यक्त की, जो ज़मीन अधिग्रहण के कारण विस्थापित हुए आदिवासी ज़मीन मालिकों के लिए बनाई गई थीं। पीठ ने यह टिप्पणी की कि ऐसी योजनाओं का कथित तौर पर कुछ व्यक्तियों द्वारा दुरुपयोग किया गया; ये लोग ज़मीन मालिकों की बेटियों से शादी करके खुद को उनका दामाद बताते थे, नौकरी के लाभ प्राप्त कर लेते थे, और बाद में कहीं और शादी करने के लिए उन शादियों को तोड़ देते थे।
अतः, पीठ ने यह फैसला सुनाया:
"इस प्रकार, इस अदालत की यह राय है कि प्रतिवादियों द्वारा उन मामलों के संबंध में एक जांच की जानी आवश्यक है, जिनमें व्यक्तियों ने पुनर्वास योजना के तहत खुद को ज़मीन मालिकों का दामाद बताकर नौकरी प्राप्त की थी। नौकरी मिलने के बाद यह दावा करते हुए दूसरी शादी कर ली कि उनकी पहली पत्नी के साथ उनका रिश्ता विवाह-विच्छेद या अलगाव के कारण समाप्त हो चुका है।"
इस प्रकार, पीठ ने एक जांच कराने का निर्देश दिया और कंपनी को यह आदेश दिया कि वह इस तरीके से नौकरी हासिल करने का दोषी पाए गए व्यक्ति के खिलाफ उचित कार्रवाई करे। इसी के साथ उक्त मामला खारिज कर दिया गया।
Case Title: Lalman Singh v South Eastern Coalfields Limited, WP-7027-2008