मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ACP को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने वाली राज्य अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया

Update: 2026-03-10 13:34 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें राज्य सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई, जिसके तहत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) के तहत सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की गईं।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने आदेश दिया:

"प्रतिवादियों को सात कार्य दिवसों के भीतर प्रक्रिया शुल्क जमा करने पर RAD (पंजीकृत डाक) के माध्यम से उचित पावती के साथ नोटिस जारी किया जाए, जिसका जवाब चार सप्ताह के भीतर देना होगा।"

यह याचिका 9 दिसंबर, 2021 को राज्य सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना को चुनौती देती है, जिसके तहत CrPC की धारा 58, 106–124, 129–132, 144 और 144-A के तहत शक्तियां सहायक पुलिस आयुक्त को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में प्रदान की गईं।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह अधिसूचना CrPC की धारा 21 के तहत जारी की गई, जो राज्य सरकार को किसी विशेष क्षेत्र और एक विशिष्ट अवधि के लिए विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट नियुक्त करने का अधिकार देती है।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि इंदौर में कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के लागू होने के बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे में बदलाव आया है। BNSS की धारा 15 के तहत ऐसी शक्तियां पुलिस अधीक्षक (SP) से नीचे के रैंक वाले किसी भी पुलिस अधिकारी को प्रदान नहीं की जा सकतीं। याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया कि इंदौर में सहायक पुलिस आयुक्तों का रैंक पुलिस उपाधीक्षक (DSP) के समकक्ष होता है। इसलिए उन्हें ऐसी शक्तियां प्रदान करना BNSS के तहत वैधानिक योजना के विपरीत है।

याचिका में आगे यह भी तर्क दिया गया कि BNSS की धारा 531 में निहित 'निरसन और बचत खंड' (repeal and saving clause) उन पिछली कार्यकारी अधिसूचनाओं को संरक्षित नहीं रखेगा जो नए कानून के प्रावधानों के साथ असंगत हैं। इसलिए 2021 की अधिसूचना नए कोड के लागू होने के बाद भी प्रभावी नहीं रह सकती। याचिकाकर्ता ने मौजूदा व्यवस्था के संवैधानिक प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई।

उनका तर्क है कि पुलिस कार्रवाई से जुड़ी कार्यवाहियों में किसी पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट के अधिकार इस्तेमाल करने की अनुमति देना, जांच और निर्णय लेने के कार्यों के बीच अलगाव के सिद्धांत को कमज़ोर करता है। साथ ही इसका भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भी असर पड़ता है।

इस दलील पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि सात कार्य दिवसों के भीतर 'प्रोसेस फीस' जमा करने पर प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए। इस नोटिस का जवाब चार सप्ताह के भीतर देना होगा।

Case Title: Saurabh Tripathi v State of Madhya Pradesh [WP-3346-2026]

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