सिंहस्थ कुंभ से पहले सड़क चौड़ीकरण: MP हाईकोर्ट ने नगर निगम अधिनियम की धारा 305 को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया
सिंहस्थ कुंभ से पहले उज्जैन में चल रहे सड़क चौड़ीकरण अभियान के बीच मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 305 की संवैधानिक वैधता (vires) को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है।
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डिवीजन बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही Ravindra Ramchandra Waghmare v. Indore Municipal Corporation मामले में धारा 305 को बरकरार रख चुका है। हालांकि, मौजूदा मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम संरक्षण दिया है।
क्या कहती है धारा 305?
मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम की धारा 305 नगर निगम को सार्वजनिक सड़क की निर्धारित सीमा को नियंत्रित करने और उस सीमा से आगे बने निर्माण को हटाने या पीछे करने का आदेश देने की शक्ति देती है।
क्या है मामला?
याचिका उज्जैन के चौबीस खंभा मार्ग स्थित एक मकान मालिक ने दायर की है। याचिकाकर्ता इस परिसर से 'ऐश्वर्या महल' नामक लॉज वैध लाइसेंस के तहत संचालित करता है।
याचिका के अनुसार, 22 सितंबर 2026 को उज्जैन नगर निगम ने याचिकाकर्ता को सूचित किया कि सड़क चौड़ीकरण के लिए भवन के पूरे फ्रंट हिस्से को ध्वस्त किया जाएगा।
नगर निगम ने कथित तौर पर याचिकाकर्ता को सात दिनों के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 305 का इस्तेमाल करके नगर निगम भूमि अधिग्रहण की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना संपत्ति पर कब्जे जैसा प्रभाव पैदा कर सकता है।
याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 के तहत निर्धारित अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया को दरकिनार करता है।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि प्रस्तावित तोड़फोड़ के लिए मकान मालिकों या उनके परिवारों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया है।
इसके अलावा, बिना सुनवाई का अवसर दिए तोड़फोड़ का नोटिस जारी किए जाने को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि कार्रवाई से याचिकाकर्ताओं का संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त आजीविका का अधिकार प्रभावित होगा।
सुप्रीम कोर्ट पहले क्या कह चुका है?
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही Ravindra Ramchandra Waghmare v. Indore Municipal Corporation मामले में धारा 305 की वैधता को बरकरार रख चुका है।
उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि धारा 305 के तहत नगर निगम को सामान्य परिस्थितियों में ऐसे निर्माण हटाने की शक्ति है जो सड़क की निर्धारित सीमा के बाहर हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यह प्रावधान स्वामित्व के अधिकार पर प्रतिबंध लगाता है और मास्टर प्लान या डेवलपमेंट प्लान के विपरीत निर्माण नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि विकास योजना तैयार होने के बाद मालिक निर्धारित ज़मीन इस्तेमाल के अधीन संपत्ति अपने पास रख सकता है और धारा 305 के तहत कार्रवाई के लिए अलग से भूमि अधिग्रहण आवश्यक नहीं है।
हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बावजूद हाईकोर्ट ने मौजूदा याचिका के मुद्दे को देखते हुए कहा कि मामले की अंतिम सुनवाई तक याचिकाकर्ता को अंतरिम संरक्षण दिया जाएगा।
कोर्ट ने आदेश दिया:
“याचिका के अंतिम निस्तारण तक प्रतिवादियों द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ की जाने वाली कोई भी कार्रवाई इस याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन होगी।”
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से तोड़फोड़, सीलिंग, बेदखली या किसी अन्य दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण की मांग की थी।
मामले में अब प्रतिवादियों के जवाब के बाद धारा 305 को चुनौती देने वाली याचिका पर आगे सुनवाई होगी।