मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने कहा है कि गंभीर जालसाजी (Forgery) के आरोप वाले उपयुक्त मामलों में सिविल कोर्ट को अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए पक्षकार या गवाह को पुलिस के पास शिकायत भेजने और FIR दर्ज कराने का निर्देश देने का अधिकार है।

जस्टिस गजेंद्र सिंह की पीठ ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो सिविल कोर्ट को इस तरह का निर्देश देने से रोकता हो। कोर्ट की यह शक्ति धारा 151 CPC में निहित अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र से जुड़ी है।

कोर्ट ने कहा कि जालसाजी धोखाधड़ी का एक गंभीर रूप है और न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने तथा ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सिविल कोर्ट उचित मामलों में अपनी inherent jurisdiction का इस्तेमाल कर सकता है।

क्या है मामला?

यह मामला कृषि भूमि से जुड़े पारिवारिक विवाद का था। याचिकाकर्ता भाइयों ने संपत्ति विवाद से संबंधित सिविल मुकदमे में अपने पिता द्वारा कथित रूप से बनाई गई एक वसीयत पेश की थी।

सिविल कोर्ट ने पाया कि वसीयत मुकदमा दायर होने के बाद तैयार की गई थी और इसे जाली माना। इसके बाद कोर्ट ने संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया।

इसी आधार पर धारमपुरी पुलिस स्टेशन में BNS की धाराओं 61 (आपराधिक साजिश), 336 (धोखाधड़ी के लिए जालसाजी), 338 (मूल्यवान प्रतिभूति/वसीयत की जालसाजी) और 340 (जाली दस्तावेज को असली बताकर इस्तेमाल करना) के तहत FIR दर्ज की गई।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की मांग की थी।

धारा 340 CrPC/379 BNSS की प्रक्रिया हर मामले में जरूरी नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी दस्तावेज की जालसाजी उसे कोर्ट में पेश किए जाने से पहले और कोर्ट के बाहर की गई थी, तो ऐसे मामले में धारा 340 CrPC के अनुरूप प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य नहीं है।

कोर्ट ने Sachida Nand Singh v. State of Bihar के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 195(1)(b)(ii) CrPC का प्रतिबंध उन मामलों पर लागू नहीं होता, जहां दस्तावेज की जालसाजी उसे अदालत में पेश किए जाने से पहले की गई हो।

कोर्ट ने कहा कि केवल इस वजह से कि बाद में वह दस्तावेज अदालत की कार्यवाही में पेश किया गया, पहले से की गई जालसाजी को धारा 195 के संरक्षण में नहीं लाया जा सकता।

FIR रद्द करने से इनकार

पीठ ने Manohar Lal Chopra v. Rai Bahadur Rao Raja Seth Hiralal (1962) में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 151 CPC अदालत को न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपनी inherent powers के इस्तेमाल की अनुमति देती है, बशर्ते उनका इस्तेमाल CPC के स्पष्ट प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के लिए न किया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर जालसाजी के मामलों में उचित परिस्थितियों में सिविल कोर्ट द्वारा पुलिस को शिकायत भेजने का निर्देश देना न्याय के उद्देश्यों के अनुरूप है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।

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