फतवे के आधार पर मुस्लिम दंपति का तलाक घोषित नहीं किया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी फतवे (Fatwa) के आधार पर मुस्लिम दंपति का तलाक घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी मदरसा या सेमिनरी (Seminary) किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक नहीं दे सकती। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने भोपाल की दारुल-दफ़ा मसाजिद कमेटी द्वारा जारी फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा की मांग करने वाले पति के मुकदमे को खारिज कर दिया।
जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने कहा कि संबंधित फतवे में कहीं भी विवाह समाप्त होने या तलाक दिए जाने की घोषणा नहीं की गई है। फतवा केवल इस्लामी ग्रंथों के उन प्रावधानों का उल्लेख करता है, जो पत्नी द्वारा कथित क्रूरता की स्थिति में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इसलिए केवल फतवे के आधार पर अदालत तलाक की घोषणा नहीं कर सकती।
मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने पति की ओर से दायर तलाक की घोषणा संबंधी वाद को खारिज करने से इनकार कर दिया था। पत्नी का तर्क था कि मसाजिद कमेटी को तलाक देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और फतवा केवल धार्मिक मार्गदर्शन देता है, कानूनी रूप से विवाह समाप्त नहीं करता।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम पुरुष भी फैमिली कोर्ट में नियमित तलाक याचिका दायर कर सकते हैं और Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 ऐसा करने से नहीं रोकता। अदालत ने माना कि पति ने यह वाद इस गलतफहमी में दायर किया था कि वह तलाक की नियमित याचिका दाखिल नहीं कर सकता।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने Order VII Rule 11 CPC के तहत वाद (Plaint) को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पति को कानून के अनुसार फैमिली कोर्ट में नई तलाक याचिका दायर करने की स्वतंत्रता रहेगी।