सुलभ न्याय की मांग वाली जनहित याचिका में दिव्यांग व्यक्ति को हस्तक्षेप की अनुमति, राज्य सरकार और हाइकोर्ट प्रशासन से जवाब तलब
मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने दिव्यांगजनों, दीर्घकालिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों, महिलाओं और सीनियर सिटीजन के लिए न्यायालय परिसरों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और हाइकोर्ट प्रशासन को जवाब दाखिल करने के लिए समय प्रदान किया। साथ ही अदालत ने एक दिव्यांग व्यक्ति को इस याचिका में हस्तक्षेप करने की अनुमति भी दी।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने दिव्यांग नरेंद्र कुमार मिश्रा द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन स्वीकार करते हुए उन्हें मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि आवेदक एक दिव्यांग व्यक्ति हैं और न्यायालय परिसरों तक दिव्यांगजनों की सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। याचिकाकर्ता की ओर से इस हस्तक्षेप पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई, जिसके बाद अदालत ने आवेदन स्वीकार कर संशोधित पक्षकार सूची दाखिल करने के निर्देश दिए।
यह जनहित याचिका एक वकील द्वारा दायर की गई, जिसमें मांग की गई है कि हाइकोर्ट और जिला कोर्ट में महिलाओं, दिव्यांगजनों, गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों और सीनियर सिटीजन के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा और सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं ताकि उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सके और उन्हें प्रभावी रूप से न्याय तक पहुंच मिल सके।
याचिका में कहा गया कि कोविड महामारी के बाद मई, 2021 में हाइकोर्ट द्वारा एक सुलभता समिति का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य दिव्यांग वकीलों और वादकारियों को आने वाली बाधाओं को दूर करना था। इसके बावजूद कई समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।
याचिकाकर्ता ने बताया कि मार्च, 2025 तक वादकारियों को आधार सत्यापन के बाद केवल एक ही प्रवेश द्वार से प्रवेश की अनुमति दी जा रही है, जो मुख्य सड़क की ओर खुलता है। यहां वादकारियों को धूप और बारिश से बचाव की किसी व्यवस्था के बिना लंबे समय तक कतार में खड़ा रहना पड़ता है।
इसके अलावा न्यायालय परिसरों में शिशु देखभाल कक्ष और स्तनपान कक्ष जैसी सुविधाओं के अभाव की ओर भी ध्यान दिलाया गया। इस संबंध में जून, 2025 में हाइकोर्ट को एक पत्र याचिका भी सौंपी गई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए इन सुविधाओं की स्थापना की मांग की गई, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि राज्य सरकार की दीनदयाल अंत्योदय रसोई योजना के तहत किफायती भोजन उपलब्ध कराया जाता है। चूंकि प्रतिदिन हजारों वादकारी हाइकोर्ट आते हैं, इसलिए न्यायालय के पास इस योजना के अंतर्गत रसोई खोले जाने की आवश्यकता बताई गई।
इन सभी तथ्यों के आधार पर याचिका में दिव्यांगजनों के लिए रैंप, लिफ्ट, बैठने और विश्राम की व्यवस्था सहित अन्य आवश्यक सुविधाओं के निर्माण के निर्देश देने की मांग की गई।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और हाइकोर्ट प्रशासन की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।