मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट' (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के तहत पुलिस असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) के खिलाफ दर्ज रिश्वत के मामले में वॉयस सैंपल की जांच रिपोर्ट का 'अनिर्णायक' (Inconclusive) होना, क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने का आधार नहीं बन सकता। [2026 LiveLaw (MP) 440]

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस दीपक खोट की डिवीजन बेंच ने ASI द्वारा दायर याचिका खारिज की। ASI ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया और मामले में आगे की जांच के निर्देश दिए गए - जिसमें फोरेंसिक जांच के लिए नए वॉयस सैंपल लेना भी शामिल था।

बेंच ने पाया कि फोरेंसिक लैब ने पर्याप्त और उचित सामग्री न होने के कारण वॉयस मैचिंग पर कोई राय नहीं दी थी।

बेंच ने कहा,

"ERP में मौजूद FSL रिपोर्ट को देखने के बाद यह कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि FSL को भेजा गया सैंपल, किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए अपर्याप्त और अनुपयुक्त था। इसलिए ऐसे अनिर्णायक सबूतों के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया जा सकता, और न ही यह माना जा सकता है कि जुटाए गए सबूतों के आधार पर कोई अपराध नहीं बनता है।"

यह मामला करण गुर्जर की एक शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने अपने मकान मालिक सैयद नोमान हुसैन पर आरोप लगाया कि उसने किराए पर दिए गए होटल परिसर में तोड़फोड़ की और होटल का सामान अपने पास रख लिया। मकान मालिक के खिलाफ धोखाधड़ी (IPC की धारा 420) का मामला दर्ज किया गया और जांच की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता ASI को सौंपी गई।

बाद में आरोप लगा कि ASI ने मामले की जांच करने और मकान मालिक के खिलाफ FIR दर्ज करने के बदले शिकायतकर्ता से 30,000 रुपये की रिश्वत मांगी। शिकायतकर्ता ने पुलिस उपाधीक्षक (DSP) से संपर्क किया, जिन्होंने उसे रिश्वत की मांग से जुड़ी बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए एक डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर दिया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता ने बाद में आरोप लगाया कि ASI ने उससे 10,000 रुपये की अवैध रकम (रिश्वत) लाने को कहा था। रिकॉर्ड की गई बातचीत जांच एजेंसी को सौंप दी गई, जिसके बाद उसका ट्रांसक्रिप्ट तैयार किया गया और याचिकाकर्ता (ASI) के खिलाफ 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट' की धारा 7 के तहत FIR दर्ज की गई।

इसके बाद जांच एजेंसी ने क्लोजर रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया कि ट्रांसक्रिप्ट से रिश्वत की कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मांग सामने नहीं आई। इसमें RFSL की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया, जो कोई राय नहीं दे सकी क्योंकि रिकॉर्ड की गई बातचीत में तुलना के लिए पर्याप्त सामान्य शब्द या उपयुक्त स्पीच सामग्री मौजूद नहीं थी।

हालांकि, स्पेशल जज (PCA) ने क्लोजर रिपोर्ट खारिज की और आगे की जांच का निर्देश दिया। इसमें याचिकाकर्ता का नया वॉयस सैंपल लेना और RFSL द्वारा उसकी दोबारा जांच कराना शामिल था।

इससे असंतुष्ट होकर ASI ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि नए वॉयस सैंपल लेने का निर्देश एक तरह की 'रोविंग इंक्वायरी' (बिना किसी ठोस आधार के की जाने वाली जांच) है और यह संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत 'खुद के खिलाफ गवाही देने से सुरक्षा' के अधिकार का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि ट्रांसक्रिप्ट से अवैध लाभ की कोई मांग या उसे स्वीकार करने की बात साबित नहीं होती, और 'ट्रैप' की कार्रवाई भी विफल रही क्योंकि न तो याचिकाकर्ता पकड़ा गया और न ही कोई रकम बरामद हुई।

याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने कहा कि ट्रायल कोर्ट जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट को मानने के लिए बाध्य नहीं है। यदि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से और जांच की जरूरत दिखती है, तो कोर्ट आगे की जांच का निर्देश दे सकता है। तर्क दिया गया कि रिकॉर्ड की गई बातचीत से प्रथम दृष्टया अनुचित लाभ की मांग का संकेत मिलता है, और वॉयस सैंपल लेना संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं है।

कोर्ट ने गौर किया कि इसमें दो कानूनी सवाल उठते हैं:

"i) क्या स्पेशल जज (P.C. Act) ने क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करके और याचिकाकर्ता का वॉयस सैंपल लेने का निर्देश देकर मामले में आगे की जांच का आदेश देने में कोई अवैधता या अनियमितता की है?

ii) क्या निचली अदालत के समक्ष पेश की गई सामग्री और सबूत 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) के तहत कोई अपराध नहीं बनाते हैं?"

बेंच ने पाया कि क्लोजर रिपोर्ट पर विचार करते समय ट्रायल कोर्ट ने देखा कि ट्रांसक्रिप्ट के आधार पर 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' के तहत अपराध दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने यह भी पाया कि डिप्टी SP ने ट्रांसक्रिप्ट सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि इस तरह की मांग अपने आप में अधिनियम की धारा 7 के तहत एक अपराध है। ट्रायल कोर्ट ने अधिनियम की धारा 7 का परीक्षण करते हुए यह पाया कि याचिकाकर्ता की आवाज़ का ट्रांसक्रिप्ट, प्रथम दृष्टया इस अधिनियम के तहत एक अपराध बनता है। इसलिए, एक मामला बनता है और इसे जांच के चरण में ही खारिज नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने कहा,

"इसलिए यह आधार कि प्रतिवादी एजेंसी द्वारा की गई जांच और जुटाए गए सबूतों से कोई अपराध नहीं बनता, पूरी जांच या FIR को रद्द करने के लिए एक ठोस आधार नहीं माना जा सकता।"

इसके अलावा, पीठ ने गौर किया कि RFSL भोपाल ने वॉयस सैंपल के मिलान के बारे में कोई राय नहीं दी है, क्योंकि जो सामग्री भेजी गई थी, वह पर्याप्त नहीं थी।

खंडपीठ ने आगे कहा;

"राय यह है कि एक ही व्यक्ति की आवाज़ में बहुत अधिक अंतर (Intra-Speaker Variation) होने के कारण, ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर अपनी आवाज़ बदलने की कोशिश की है। डेटा में मौजूद बातचीत भी ठीक नहीं है, और उसमें उचित शब्द या वाक्यांश/वाक्य नहीं हैं। इसलिए यह राय दी गई कि ऐसे वॉयस सैंपल के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।"

सुप्रीम कोर्ट के 'रामस्वरूप सोनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले और अन्य मामलों का हवाला देते हुए, पीठ ने दोहराया कि यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि जांच में कोई कमी है या उसमें पर्याप्त सामग्री और सबूत नहीं हैं, तो उन्हें फिर से जांच (Re-Investigation) का आदेश देने का अधिकार है।

मामले के तथ्यों और सबूतों को देखते हुए अदालत ने माना कि मजिस्ट्रेट ने क्लोज़र रिपोर्ट को खारिज करके और याचिकाकर्ता का वॉयस सैंपल लेकर आगे की जांच का आदेश देकर कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया है, न ही कोई अनियमितता या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती की है। तदनुसार, याचिका खारिज की जाती है।

Case Title : Sanjay Sisodiya v State of MP

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: