मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि बेटों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिल जाता। 'जन्मसिद्ध अधिकार' (Birthright) की अवधारणा 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' की धारा 8 के तहत लागू नहीं होती है। [2026 LiveLaw (MP) 443]

यह स्पष्ट करते हुए कि बेटे अपने पिता की मृत्यु के बाद ही पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने के हकदार होते हैं, जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा:

"यह स्पष्ट है कि 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम' लागू होने के बाद 'जन्मसिद्ध अधिकार' का सिद्धांत अब अस्तित्व में नहीं है। बेटे को संपत्ति में हिस्सा तभी मिलता है जब उसके पिता की मृत्यु हो जाती है। केवल उस स्थिति में, जब कोई सह-उत्तराधिकारी (Coparcener) 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम' लागू होने से पहले पैदा हुआ हो, तो धारा 6 के तहत संपत्ति जीवित बचे सह-उत्तराधिकारियों को मिल सकती है।"

अपीलकर्ताओं ने अपीलीय अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था और संपत्ति पर मालिकाना हक, कब्जे और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करने वाले उनके मुकदमे को खारिज कर दिया था।

अदालत ने अपने फैसले में अपीलकर्ताओं को 'वादी' (Plaintiffs) और प्रतिवादियों को 'प्रतिवादी' (Defendants) कहा है। तथ्यों के अनुसार, विवादित जमीन प्रतिवादी नंबर 1 की पैतृक संपत्ति है। वादी नंबर 1, प्रतिवादी नंबर 1 की पत्नी हैं, और याचिकाकर्ता 2 व 3 उनके बेटे हैं।

याचिकाकर्ताओं ने मुकदमा दायर करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन उनके पिता (प्रतिवादी नंबर 1) और उनके भाइयों के नाम पर दर्ज है और यह उनकी पैतृक संपत्ति है। 21 जुलाई 2010 को पिता ने इस जमीन को बेचने की धमकी दी और कहा कि वे उन्हें इसमें से कोई हिस्सा नहीं देंगे। इसलिए वादियों ने जमीन पर अपना मालिकाना हक और कब्जा घोषित करने, तथा स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की डिक्री पाने के लिए मुकदमा दायर किया।

मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी संख्या 1 (पिता) ने विवादित जमीन का एक हिस्सा प्रतिवादी संख्या 3 को बेच दिया। इसके बाद, वादियों ने अपने दावे (plaint) में संशोधन किया और प्रतिवादी संख्या 3 को भी मुकदमे में एक पक्षकार के रूप में शामिल कर लिया। साथ ही, उन्होंने यह घोषणा करने की भी मांग की कि 20 अप्रैल 2011 का बिक्री विलेख (Sale Deed) अमान्य और शून्य (null and void) है।

पिता ने अपने लिखित बयान में विवादित जमीन पर वादियों का दावा खारिज कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि उनके और उनके भाइयों के बीच कोई विवाद नहीं था और विवादित जमीन का बंटवारा पहले ही हो चुका था। पिता ने यह भी दावा किया कि उनके जीवित रहते हुए, वादियों का विवादित जमीन पर कोई अधिकार नहीं बनता है।

ट्रायल कोर्ट ने 'चंद्रकांता बनाम अशोक कुमार [2002 (3) MPLJ 576]' मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 ने पैतृक संपत्ति में 'जन्मसिद्ध अधिकार' (Birthright) की अवधारणा को खत्म कर दिया है।

अदालत ने गौर किया कि वादी संख्या 1, जो प्रतिवादी संख्या 1 की पत्नी हैं, वे 'सह-उत्तराधिकारियों' (Coparceners) की श्रेणी में नहीं आतीं; इस श्रेणी में केवल बेटे ही आते हैं। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 ने पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार की अवधारणा को समाप्त कर दिया है।

इस प्रकार, वर्तमान मामले में पीठ (bench) ने माना:

"इस मामले में वादियों ने खुद अपने दावे (Plaint) के पैरा 2 में यह स्वीकार किया है कि प्रतिवादी संख्या 1 को यह जमीन अपने पिता से बंटवारे में मिली थी। इसका मतलब यह है कि यह संपत्ति प्रतिवादी संख्या 1 को मिली और बंटवारे के बाद यह उनकी 'स्व-अर्जित संपत्ति' (Self-Acquired Property) बन गई। नतीजतन, पिता (यानी प्रतिवादी संख्या 1) के जीवित रहते हुए, वादी इस संपत्ति में किसी हिस्से का दावा नहीं कर सकते थे। अपीलीय अदालत का यह विचार कि विवादित संपत्ति वादियों की 'सह-उत्तराधिकार वाली संपत्ति' (Coparcenary Property) नहीं है, सही है - हालांकि इसके कारण वे हैं जो ऊपर बताए गए हैं।"

इस प्रकार, अदालत को अपीलीय अदालत के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं मिली, इसलिए अपील खारिज की गई।

Case Title : PB v RS

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