चुने हुए पंचायत सदस्य को कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है: एमपी हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत के चुने हुए सदस्य के पास किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेश की रिट) की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। [2026 LiveLaw (MP) 400]
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि 'रिट ऑफ़ मैंडमस' का इस्तेमाल कानूनी अधिकार और उससे जुड़े कानूनी/सार्वजनिक कर्तव्य को लागू करने के लिए किया जाता है, जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने कहा:
"यह तथ्य कि याचिकाकर्ता जनपद पंचायत का चुना हुआ सदस्य है और उसने किसी कर्मचारी के कामकाज के बारे में शिकायतें/आवेदन दिए, उसे उस कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए 'रिट ऑफ़ मैंडमस' की मांग करने का अधिकार नहीं देता है।"
याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए आवेदन पर विचार करने में एमपी राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (प्रतिवादी नंबर 3) के कलेक्टर/मिशन डायरेक्टर की निष्क्रियता के खिलाफ एक रिट याचिका दायर की गई।
इस आवेदन में याचिकाकर्ता ने संबंधित पंचायत में अजयगढ़ के असिस्टेंट ब्लॉक मैनेजर/असिस्टेंट लाइवलीहुड मैनेजर (प्रतिवादी नंबर 5) द्वारा कुछ अनियमितताओं और गैर-कानूनी कामों का आरोप लगाया।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि वह संबंधित जनपद पंचायत का चुना हुआ सदस्य है और उसने अनियमितताओं और गैर-कानूनी कामों का आरोप लगाते हुए कई आवेदन दिए, जिनमें स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को हटाना, वित्तीय अनियमितताएं और सार्वजनिक धन का दुरुपयोग शामिल है।
यह बताया गया कि प्रतिवादी नंबर 5 का तबादला ब्लॉक शाहनगर में कर दिया गया, लेकिन वह ब्लॉक अजयगढ़ में ही बना रहा। यह भी बताया गया कि प्रतिवादी नंबर 5 के चाचा उसी पंचायत में मिशन ऑफिसर के पद पर तैनात हैं। यह तर्क दिया गया कि बार-बार आवेदन देने के बावजूद, सक्षम अधिकारी द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई।
राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने तर्क दिया कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे सर्विस पोस्टिंग से संबंधित हैं, इसलिए याचिकाकर्ता को रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए कोई स्वतंत्र आधार नहीं देते हैं।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपना कोई ऐसा कानूनी अधिकार नहीं दिखा पाया, जिस पर असर पड़ रहा हो। इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज की।
Case Title : Lalaram Singh v State of Madhya Pradesh