मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ़ इस आधार पर कि आरोपी एक्साइज़ विभाग का अधिकारी है, जांच को CBI को सौंपना सही नहीं ठहराया जा सकता। [2026 LiveLaw (MP) 396]

जस्टिस संदीप एन भट्ट और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डिवीजन बेंच ने कहा,

"जांच CBI को सौंपने का आदेश उचित नहीं है, क्योंकि पुलिस अधिकारियों को मामले की जांच के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला और यह नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ़ इसलिए कि आरोपी एक्साइज़ अधिकारी है, जांच CBI को सौंपी जानी चाहिए।"

यह मामला देवास और इंदौर में शराब की लाइसेंसी दुकानें चलाने वाले दिनेश मकवाना की मौत से जुड़े आरोपों से उपजा है। आरोपों के अनुसार, एक्साइज़ असिस्टेंट कमिश्नर ने मृतक से प्रति दुकान ₹1.5 लाख प्रति माह की मांग की।

याचिकाकर्ता के अनुसार, मृतक ने ₹22 लाख का भुगतान किया, लेकिन उससे लगातार पैसे की मांग की जाती रही और धमकियां दी जाती रहीं। आरोप है कि इसके बाद 8 नवंबर, 2025 को ज़हर खाकर मृतक ने आत्महत्या कर ली और मरने से पहले एक वीडियो रिकॉर्डिंग भी की। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस मामले की ठीक से जांच करने में विफल रही।

आरोपों के बाद हाईकोर्ट में रिट पिटीशन दायर की गई, जिसमें सिंगल जज बेंच ने CBI को FIR दर्ज करके जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दिया। CBI द्वारा FIR दर्ज करने के बाद आरोपी एक्साइज़ अधिकारी ने सिंगल जज बेंच के आदेश को डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी।

17 जुलाई, 2026 को डिवीजन बेंच ने रिट अपील स्वीकार की और सिंगल जज का आदेश रद्द किया। इससे असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने डिवीजन बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए रिव्यू पिटीशन दायर की।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि डिवीजन बेंच ने इस धारणा के आधार पर कार्रवाई की कि संविधान के अनुच्छेद 226 का सहारा लेने से पहले रिव्यू पिटीशन में CrPC की धारा 154(3), 156(3) और धारा 200 के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि डिवीज़न बेंच यह समझने में नाकाम रही कि आरोप एक्साइज़ डिपार्टमेंट में ज़िम्मेदार पद पर बैठे एक सीनियर सरकारी अधिकारी के ख़िलाफ़ लगाए गए।

प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि CPC के ऑर्डर 47 नियम 1 के तहत समीक्षा (Review) का कोई आधार नहीं बताया गया। यह भी कहा गया कि समीक्षा, अपील का ही एक छिपा हुआ रूप नहीं हो सकती।

बेंच ने CPC के ऑर्डर 47 नियम 1 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे पर विचार किया, जो फ़ैसले की समीक्षा की प्रक्रिया बताता है। सुप्रीम कोर्ट के मामलों का हवाला देते हुए बेंच ने समीक्षा की शक्ति और अपील की शक्ति के बीच अंतर को फिर से स्पष्ट किया।

मौजूदा याचिका में उठाए गए आधार पर विचार करते हुए बेंच ने इसकी भाषा से यह पाया कि याचिकाकर्ता समीक्षा के बजाय अपील के अधिकार क्षेत्र (Appellate Jurisdiction) का इस्तेमाल करने की मांग कर रहा था।

अदालत ने याचिकाकर्ता के आचरण पर गंभीरता से ध्यान दिया और कहा:

"यह ध्यान देना ज़रूरी है कि पुलिस अधिकारियों से संपर्क करके वीडियो रिकॉर्डिंग देने, उसके बाद चार दिनों के भीतर याचिकाकर्ता द्वारा रजिस्टर्ड पोस्ट भेजने और फिर ठीक अगले दिन याचिका दायर करने व संबंधित अधिकारी को सूचना भेजने की पूरी प्रक्रिया, समीक्षा याचिकाकर्ता के आचरण और इरादे को दर्शाती है।"

इसके अनुसार, अदालत ने समीक्षा याचिका ख़ारिज की, क्योंकि डिवीज़न बेंच के आदेश में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं।

Case Title : Santosh v State of Madhya Pradesh

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