भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद विवाद | ASI के रिकॉर्ड और शिलालेखों से पता चलता है कि वहां मंदिर था: हिंदू याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में कहा
भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद विवाद पर चल रही सुनवाई मे याचिकाकर्ताओं में से एक कुलदीप तिवारी ने दलील दी कि उस जगह पर मिले शिलालेखों से साफ तौर पर मंदिर के अवशेष होने की बात साबित होती है।
यह विवाद भोजशाला से जुड़ा है, जो 11वीं सदी का एक स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। हिंदू इस जगह को वाग्देवी, यानी देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानते हैं, जबकि मुसलमान इसे कमल मौला मस्जिद मानते हैं। ASI द्वारा 2003 में किए गए एक समझौते के तहत, हिंदू इस परिसर में मंगलवार को पूजा करते हैं, जबकि मुसलमान शुक्रवार को वहाँ नमाज़ पढ़ते हैं।
एक जनहित याचिका (PIL) में इस जगह की वैज्ञानिक जांच की मांग की गई, जिसका मकसद हिंदू समुदाय की ओर से इस जगह पर फिर से अपना अधिकार जताना है। इसके अलावा, याचिका में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को इस परिसर में नमाज़ पढ़ने से रोकने की भी मांग की गई।
बता दें, हाईकोर्ट ने इस जगह का सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया था। हालांकि, इस आदेश को धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वेक्षण की अनुमति देते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह रिपोर्ट को खोले, उसकी प्रतियां संबंधित पक्षों को दे और अंतिम सुनवाई के दौरान उनकी आपत्तियों पर विचार करे।
सुनवाई के दौरान, तिवारी की ओर से पेश हुए वकील मनीष गुप्ता ने अपनी जवाबी दलील में कहा कि शिलालेख और ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस जगह को किसी स्कूल या मस्जिद के बजाय एक मंदिर के रूप में पहचानते हैं। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक दस्तावेज़ का हवाला दिया, जिससे पता चलता है कि अवशेषों से मिली ईंटें 11वीं सदी की हैं; यह इस बात का संकेत है कि मस्जिद बनने से पहले वहाँ एक मंदिर की संरचना मौजूद थी।
वकील गुप्ता ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के सामने उन कलाकृतियों के बारे में भी चर्चा की, जो इस समय ब्रिटिश संग्रहालय में रखी हुई हैं। उन्होंने बताया कि एक मूर्ति के आधार पर खुदे शिलालेख से इस बात की पुष्टि होती है कि उस मूर्ति की औपचारिक प्राण-प्रतिष्ठा राजा भोज ने करवाई थी और वह मूर्ति देवी वाग्देवी की है; यह उस दावे के बिल्कुल विपरीत है, जिसमें कहा गया कि वह मूर्ति जैन देवी अंबिका की है।
आगे कहा गया,
"इस शिलालेख में साफ़-साफ़ लिखा है कि इस मूर्ति की औपचारिक रूप से राजा भोज ने प्राण-प्रतिष्ठा की थी। दूसरी पंक्ति में कहा गया कि यह मूर्ति वाग्देवी की है... पहले जैन समुदाय ने दावा किया कि यह मूर्ति अंबिका की है, लेकिन मूर्ति के विवरण से साफ़ पता चलता है कि यह वाग्देवी की है।"
गुप्ता ने अपनी दलीलें समाप्त करते हुए दावा किया,
"भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, इसी जगह से शिव, ब्रह्मा और विष्णु की अर्धनारीश्वर रूप वाली मूर्तियां मिली हैं।"
इस बीच, 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' की ओर से पेश हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी जवाबी दलील में कहा कि 'पूजा स्थल अधिनियम, 1991' इस जगह पर लागू नहीं होता, क्योंकि यह 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' के तहत संरक्षित है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि 1958 के अधिनियम की धारा 16(1) का हवाला देते हुए ASI की यह कानूनी ज़िम्मेदारी है कि वह इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखे।
उल्लेखनीय है, धारा 16(1) में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित कोई भी स्मारक—जो पूजा स्थल या तीर्थस्थल हो—का उपयोग किसी ऐसे उद्देश्य के लिए नहीं किया जाएगा जो उसके मूल स्वरूप के विपरीत हो।
जैन ने 12 दिसंबर, 2024 के उस आदेश का भी ज़िक्र किया, जो 'अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ' मामले में आया था; जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगले आदेश तक देश में पूजा स्थलों के ख़िलाफ़ कोई भी नया मुक़दमा दर्ज नहीं किया जा सकता। जैन ने दलील दी कि यह आदेश मौजूदा याचिका दायर होने के बाद पारित किया गया, इसलिए नए मुक़दमे दायर करने पर लगी रोक इस मौजूदा मामले पर लागू नहीं होगी।
जैन ने आगे दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मौजूदा मामले को 'अश्विनी कुमार उपाध्याय' मामले से जुड़ी याचिकाओं के समूह के साथ जोड़ दिया था। फिर इस मामले को फ़ैसले के लिए वापस हाईकोर्ट भेज दिया। इसलिए इससे यह भी साबित होता है कि 12 दिसंबर, 2024 का आदेश इस मामले पर लागू नहीं होगा।
पिछली सुनवाई के दौरान, मामले में याचिकाकर्ता जैन समुदाय ने दलील दी थी कि इस विवादित स्थल की वास्तुकला से जुड़ी विशेषताएं, माउंट आबू में स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिरों की विशेषताओं से काफ़ी मिलती-जुलती हैं।
Case Title: Hindu Front For Justice v Union of India WP 10497/2022, Antar Singh WP/6514/2013, Maulana Kamaluddin Welfare Society WP/28334/2019, Kuldeep Tiwari WP/10484/2022 and Qazi Zakullah WA/559/2026