भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 16: अभियोजन की मंजूरी

Update: 2022-09-07 06:50 GMT

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 19 अभियोजन की मंजूरी का उल्लेख करती है। इस अधिनियम के तहत कोई भी अभियोजन सरकार की मंजूरी के बगैर नहीं चलाया जा सकता। धारा 19 इस ही मंजूरी से संबंधित नियमों का उल्लेख करती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 19 से संबंधित न्याय निर्णयों पर चर्चा की जा रही है।

अभियोजन की मंजूरी

एक मंजूरी के लिए प्रावधान करने में विधान मंडल का आशय मात्र उनके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में लोक सेवकों को एक युक्तियुक्त संरक्षण प्रदान करना होता है। इस धारा का उद्देश्य यह नहीं होता है कि एक लोक सेवक जो अधिनियम की धारा 6 में उल्लेखनीय विशेष अपराधों का दोषी है, को मंजूरी की अवैधानिकता के एक तकनीकी अभिवचन को प्रस्तुत करके आपराधिक कार्यों के परिणामों से बच निकलना चाहिए। यह धारा निर्दोष के लिए एक रक्षोमय है और न कि दोषी व्यक्ति के लिए एक रक्षा कवच है।

इस निर्देश की सुसंगत तिथि जब वह वैसा रहने से सभी परिविरत हो जाता है जब उसके विरुद्ध अभियोजन की कार्यवाही प्रारंभ की जाती है। कारण कि धारा 6 को मात्र लोक सेवकों को अभियोजित करने के लिए ही अभिनियमित किया गया था और न कि गैर लोक सेवकों को अभियोजित करने के लिए।

धारा 6 उन सभी लोक सेवकों को अभियोजित किए जाने से संरक्षण प्रदान करती है जो अपराध के कारित किये जाने की तिथि तथा अपराध के संज्ञान लिये जाने की तिथि पर कार्यालय में थे। निम्नलिखित में से किसी भी मामले में भी धारा 6 द्वारा लोक सेवक को संरक्षण प्रदान किया गया और उसके अभियोजन के लिए मंजूरी आवश्यक नहीं होगी। प्रथम- जब आरोपित अपराध को उसके एक लोक सेवक होने के पूर्व कारित किये जाने का अभिकथन किया जाता है: हालांकि अभियोजन, उसके द्वारा एक लोक सेवक के कार्यालय को धारण किये जाने के समय प्रारंभ किया जाता है; और दूसरे, जहां अभिकथित अपराध उसी तिथि पर कारित किया गया जब वह एक लोक सेवक था। जिसकी एक विधिमान्य मंजूरी एक लोक सेवक द्वारा कारित किये गये एक अपराध का संज्ञान लेने के लिए अनिवार्य है क्योंकि धारा 6 द्वारा आपेक्षित ऐसी तिथि पर है यह संभव हो सकता है जिस पर ऐसे अपराध का संज्ञान लेने के लिये न्यायालय से निवेदन किया जाता है जिसका अभियुक्त दोषी होना है।

एक मामले में न्यायाधीश द्वारा संज्ञान लिये जाने के पूर्व ही पदच्युत कर दिया गया। यह तर्क किया गया। जब एकवार अभियुक्त सेवा निवृत्त हो गया और एक दूसरे को मामले का विशेष कि अधिनियम की धारा 6 के अधीन अभियोजन के लिए मंजूरी, धारा 5 (2) सपठित धारा 3(1) (ग) के अधीन अपीलकर्त्ताओं के अभियोजन के लिए न तो प्राप्त की गयी और न ये उसे साबित हो किया गया।

एआईआर 1980 उच्चतम न्यायालय 52 राज्य बनाम एअर कमांडर कैलाश चन्द्र में प्रकाशित किये गये निर्णय से पृथक, आधुनिकतम विनिश्चय ए आई आर 1984 उच्चतम न्यायालय 684 और एस नायक बनाम ए आर अतुले में प्रकाशित किया गया जिनमें यह अभिनिर्धारित किया गया कि ऐसी सुसंगत तिथि का निर्देश जिसके सन्दर्भ में धारा 6 द्वारा यथोपेक्षित लोक सेवक द्वारा कारित किये गये एक अपराध का संज्ञान लेने के लिए एक विधि मंजूरी अनिवार्य होती है, वह तिथि होती है जिस पर न्यायालय से ऐसे अपराध का लेने का निवेदन किया जाता है जिसका वह दोषी होता है। इस प्रतिपादना की दृष्टिकोण के यह होती है। वैसा मामला नहीं था जिसमें अधिनियम की धारा 6 के अधीन मंजूरी आवश्यकता थी।

यदि अधिनियम की धारा 6 (1) (ख) को विधिवत् ढंग से पढ़ा जाए, तो यह ज्ञात होगा कि इसका उद्देश्य एक लोक की परेशानी तथा उद्वेगकारी अभियोजन को रोक का होता है। यह इस बात का आश्वासन देती है कि एक ईमानदार लोक सेवक को एक वाय करने की स्थिति में नहीं होगा और इसलिए अनेक लोगों के दुःख को करता है। यह दुःख उसके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित विद्वेषपूर्ण अभियोजन का जन्म होगा। यही वजह है जिसके परिणाम स्वरूप विधायिका ने उसके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में लोक सेवकों को एक युक्तियुक्त संरक्षण प्रदान करने के संदर्भ में प्रावधान किया जिससे कि वे उमकारी अनावश्यक अभियोजन द्वारा निर्वाधित की गयी दानों एवं उनके कर्त्तव्यों को चालू रखते हैं।

एक विधिमान्य मंजूरी की अपेक्षायें

सुसंगत तात्विकाओं को स्वीकृति प्रदान करने वाले प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाना-जहाँ एक विधिमान्य मंजूरी के लिए यह अवश्यमेव साबित किया जाना चाहिए कि मंजूरी अभ्यारोपित किये गये अपराध का गठन करने वाले तथ्यों के सन्दर्भ में दी गयी थी। यह स्पष्ट रूपेण वांछित है कि तथ्य को मंजूरी को देखते ही निर्देशित किया जाना चाहिये लेकिन यह एक आवश्यक तत्व नहीं है, कारक कि कानून मंजूरी के किसी विशेष प्रारूप में होने की अपेक्षा नहीं करता है और न ही यह इसके लिखित होने की अपेक्षा करती है।

यदि आरोपित किये गये अपराध का गठन करने वाले तथ्यों को मंजूरी को देखते ही प्रदर्शित नहीं किया जाता है, तो अभियोजन को अवश्यमेव यह साबित करना चाहिए कि उन सभी तथ्यों को मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अभियोजित करने के लिए मंजूरी एक आवश्यक तत्व है, यह अभियोजन के संस्थित किये जाने की एक पूर्ववर्ती शर्त की रचना करता है और सरकार के पास उनकी मंजूरी को स्वीकृति प्रदान करने या उन्हें रोकने की एक पूर्ण या अनन्य स्वविवेकाधिकार की शक्ति होती है।

उनका संबंध न केवल मात्र यह देखने के लिए होता है कि साक्ष्य अभियोजित किये जाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध मात्र एक प्रथम दृष्टया मामले को प्रकट करता है। वे किसी भी ऐसे आधार पर मंजूरी को अस्वीकृत कर सकते हैं जो कि स्वतः उन्हें आदेश प्रदान करते हैं।

उदाहरणार्थ- यह राजनैतिक या आर्थिक आधार पर वे अभियोजन को अनिवार्य होने की मान्यता प्रदान करते हैं। एक परिवाद के सन्दर्भ में यह सुस्पष्ट है कि सरकार इसका निस्तारण करने के बाध्यता का पूर्णतया उन्मोचन नहीं कर सकता है कि क्या मामले के तथ्यों की जानकारी के बिना ही एक मंजूरी प्रदान करना है या उसे रोक देना है।

एक मामले में कहा गया है कि जहां मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी को अभियुक्त के नाम मात्र की जानकारी करायी जाती है और उस खंड के अधीन जो स्वीकृति या मंजूरी अभियुक्त के अभियोजन के लिए प्रदान की जाती है, वहां यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभिलेख पर यह प्रदर्शित करने के लिए कोई साक्ष्य विद्यमान नहीं थे कि मंजूरी प्रदान करने वाला प्राधिकारी को अभियुक्त के विरुद्ध अपराध का गठन करने के लिए अभिकथित तथ्यों की जानकारी रखता था और इसलिए मंजूरी अवैधानिक थी।

एक अन्य प्रकरण में मंजूरी प्रदान करने के पूर्व मंजूरी प्रदानकर्ता अधिकारी द्वारा स्वविवेक का समुचित तौर पर प्रयोग किया जाना चाहिये मंजूरी के प्रावधान का उद्देश्य यह होता है कि मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी को स्वतः इस निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व साक्ष्य पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए कि मामले की परिस्थितियों के अधीन अभियोजन को मंजूर किया जाना चाहिए या अस्वीकृत कर दिया जाता। यह मंजूरी के प्रारूप से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी को उसे स्वीकृत करने के पूर्व साक्ष्य पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

इस मामले की संपूर्ण परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् ही मंजूरी प्रदानकर्ता प्राधिकारी ने मामलों के अभियोजन को स्वीकृत कर दिया। अतएव, जब तक मामले को दूसरे साक्ष्य द्वारा साबित नहीं कर दिया जाता है। तब तक स्वतः मंजूरी में तथ्यों को यह उपदर्शित करने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए कि मंजूरी प्रदानकर्ता प्राधिकारी ने मामले के तथ्यों एवम् परिस्थितियों के प्रति अपने स्वविवेक का प्रयोग किया था।

न्यायालय में निष्कर्ष को मंजूरी का अर्धान्वयन को यथार्थवादी निश्चित रूपेण होना चाहिए और गणितीय शुद्धता एवम् तार्किक संक्षेपतः तच्चों के कथनों के आधार एक अत्यधिक विवशता के द्वारा आच्छादित नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय को पदों के प्रारूपों में अत्यधिक सुन्दर एवं छोटी-मोटी भिन्नताओं की कठोर प्रेक्षण का प्रत्याशा नहीं करना चाहिए।

एक मामले में अभियुक्त पर अवैध परितोषण स्वीकार करने का आरोप लगाया गया। प्राप्त की गयी मंजूरी को अभिलेख पर प्रस्तुत नहीं किया गया जहां अभिलेख पर यह प्रदर्शित करने वाले साक्ष्य विद्यमान नहीं थे मंजूरी प्रदानकर्ता प्राधिकारी ने इसे स्वीकृत करने के पूर्व अपनी सूझ-बुझ का प्रयोग किया था, वहां यह मंजूरी अवैधानिक थी और दोषसिद्ध इस पर आधारित होना नहीं निर्णीत किया जा सकता था।

अपराध के गठन करने वाले तथ्य

जहाँ अपराध का गठन वाले तथ्यों द्वारा अभियोजन को मंजूरी प्रदान करने वाले आदेश को देखते ही यह प्रतीत नहीं होता है या जहां वह आदेश यह प्रदर्शित करने का लोप करता है कि इसे उन सभी तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए प्रदान किया गया। जिसके आधार पर मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी ने, वास्तव में, उसे मंजूरी दे दिया तब उसे अंगीकार करने के लिए अभियोजन का वस्तु विषय यह होता है कि अन्य साक्ष्यों द्वारा यह साबित कर दिया जाना चाहिए कि अपराध का गठन करने वाले महत्वपूर्ण तथ्यों को अभियोजन के समक्ष प्रस्तुत किये गये और जहाँ पर ऐसा नहीं किया जाता है; वहां मंजूरी प्रदान नहीं की जानी चाहिए; बल्कि यदि मंजूरी प्रदान कर दी गयी भी हो; तो उसे अवैधानिक माना जाना चाहिए।

मंजूरी प्रदान करने का उद्देश्य मात्र तुच्छ, संदेहास्पद एवं प्रदूषित अभियोजनों को निरुत्साहित करना होता है। आदेश को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी ने स्वयमेव के समक्ष प्रस्तुत किये गये सभी महत्वपूर्ण तथ्यों पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के पश्चात् ही अभियोजन के लिए स्वीकृति प्रदान किया था। सचिवालय की फाइल यह प्रदर्शित करता था यदि ड्राफ्ट मंजूरी आदेश केन्द्रीय सरकार तथा अतिरिक्त अभियोजन द्वारा भेजा गया।

यहां सचिवालय ने यह फाइल प्रस्तुत किया कि ड्राफ्ट मंजूरी आदेश द्वारा भेजा गया अतिरिक्त सचिव ने उस पर हस्ताक्षर किया लेकिन कथित फाइल में पुलिस अधीक्षक, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन की रिपोर्ट विद्यमान थी और स्वीकृति या मंजूरी आदेश ऐसे अनेक वाउचरों का उल्लेख किया गया जिनके जाली होने के बारे में भी अभिकथन किया गया था।

तदुपरान्त वह यह कथन करते थे कि तात्विकताओं का सावधानीपूर्वक परीक्षण करने के पश्चात् तथा इस बात का समाधान हो जाने पर कि अभियोजना को आदेश प्रदान किया गया, वहाँ यह सभी निर्धारित किया गया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 (ङ) के अधीन न्यायिक एवम् शासकीय कृत्य को अनियमित पूर्वक ढंग से संपादित किया गया और मंजूरी पूर्णतया विधिक एवम् उचित थी।

मोहम्मद इकबाल अहमद बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, ए आई आर 1976 उच्चतम न्यायालय 677 1976 क्रि लॉ ज 633 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निम्नवत्त ढंग से प्रेक्षण किये गये।

यह साबित करना कि अभियोजन के लिए अनिवार्य होता है विधिमान्य मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी द्वारा इस बात का पूर्णतया समाधान कर लिए जाने के पश्चात् मंजूरी प्रदान की गयी है कि मंजूरी के लिए यह मामलों को अपराध का गठन करने के लिए प्रदान किया जा चुका है। इस दो ढंगों से साबित किया जाना चाहिए; या तो ऐसी मौलिक मंजूरी को प्रस्तुत करके जो स्वमेव अपराध का गठन करने वाले तथ्यों को तथा समाधान के आधारों को धारण करता है। इसके अलावा उन तथ्यों को प्रदर्शित करने साक्ष्यों को पेश करके जिनके आधार पर इसके द्वारा समाधान हो जाने संबंधी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है।

एक समुचित मंजूरी के बिना ही संस्थित किये गये किसी भी मामले को अश्वयमेव अभियोजन में प्रत्यक्ष त्रुटि होने के कारण असफल हो जाना चाहिए अर्थात् संपूर्ण कार्यवाही प्रारंभ से ही शून्य हो जाती है। न्यायालय को जिस बात से अवगत होना होता है; वह यही कि क्या मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी को अपराध का गठन करने वाले तथ्यों के बारे में जानकारी हो गयी थी या नहीं और क्या उसने उसके लिए समुचित विवेक का प्रयोग किया था या नहीं।

कोई भी पश्चात्वर्ती तथ्य जो मंजूरी की स्वीकृति के पश्चात् अस्तित्व शील होता है, पूर्णतया असुसंगत होता है। मंजूरी को स्वीकृति एक मात्र निष्क्रिय औपचारिकता है। बल्कि यह एक गंभीर कार्य होता है जो सरकारी सेवकों को तुच्छ अभियोजन के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है और परिणामतः सम्बन्धित लोक सेवक के विरुद्ध किसी कार्य के प्रारंभ होने के पूर्व इसका कठोरतापूर्वक ढंग से अवश्यमेव अनुपालन किया जाना चाहिए।

दीवान चन्द्र बनाम राज्य, 1982 क्रि लॉ ज 720 भ्रष्टाचार अधिनियम 1947 की धारा 5 (1) तथा 5 (2) के अधीन दंडनीय अपराध के लिए बुकिंग लिपिक को अभियोजित करने के लिए संबंधित रेलवे विभाग के महाप्रबंधक द्वारा प्रदान की गयी मंजूरी अपराध का गठन करने वाले सभी तथ्यों को धारण करते थे। साक्ष्य से यह प्रदर्शित किया कि मंजूरी के सम्पूर्ण निकाय को महाप्रबंधक के क्लर्क द्वारा तैयार किया गया यह कि इसे उसका हस्ताक्षर ठीक कराने के लिए उसे भेजा गया था।

मंजूरी में अंततोगत्वा उपर्युक्त कार्यों के बाबत अन्य कानूनी प्रावधानों के अधीन दंडनीय दूसरे अपराधों को और शब्द विद्यमान थे। यदि वह महाप्रबंधक जो सर्वाधिक वरिष्ठ अधिकारी या वास्तव में मामले के तथ्यों के प्रति अपने विवेक का प्रयोग किया होता; तो वह धारा (1) (ग) के अधीन मंजूरी प्रदान करते समय, अंत में ऐसे असुसंगत मामले को न जोड़ा होता। यह प्रत्यक्ष है कि उसने मात्र स्वतः के समक्ष प्रस्तुत किये गये सम्पूर्ण तथ्यों एवम् तात्विकताओं यदि कोई हो तो उन पर स्वयमेव के विवेक का समुचित तौर पर प्रयोग किये बिना ही उसके उसके प्रधान लिपिक (Head Clerk) द्वारा निर्मित की गयी स्वीकृति पर मात्र हस्ताक्षर किया था। दूसरे शब्दों में, उसने यान्त्रिक तरीके से स्वीकृति प्रदान की थी। अतएव ऐस स्वीकृति मान्य एवं कानूनी होने की मान्यता नहीं प्रदान की जा सकती है।

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