न्यायालय के निर्णय की भाषा और और दंड निर्धारण की प्रक्रिया – धारा 393, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

न्यायालय (Court) द्वारा दिए गए निर्णय (Judgment) में यह तय किया जाता है कि अभियुक्त (Accused) दोषी है या नहीं। यदि दोषी है, तो उसे क्या दंड (Punishment) दिया जाएगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 393 में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की भाषा और उसकी सामग्री कैसी होनी चाहिए। यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय स्पष्ट, न्यायपूर्ण और पारदर्शी हो।
निर्णय की भाषा (Language of the Judgment)
धारा 393(1)(a) के अनुसार, हर निर्णय न्यायालय की आधिकारिक भाषा (Official Language) में लिखा जाएगा। यह इसलिए आवश्यक है ताकि निर्णय को अधिवक्ताओं (Advocates), अभियुक्त (Accused), पीड़ित (Victim), और न्यायालय के अन्य संबंधित व्यक्तियों द्वारा आसानी से समझा जा सके।
उदाहरण के लिए, यदि उत्तर प्रदेश में कोई मामला चल रहा है, तो निर्णय हिंदी में लिखा जाएगा। इसी प्रकार, तमिलनाडु में यह तमिल में हो सकता है। हालांकि, यदि निर्णय को हाईकोर्ट (High Court) या सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में भेजना हो, तो उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया जा सकता है।
निर्णय की आवश्यक सामग्री (Essential Contents of a Judgment)
निर्णय केवल यह कहने तक सीमित नहीं होता कि अभियुक्त दोषी है या नहीं। इसमें कुछ महत्वपूर्ण बिंदु (Key Points) होते हैं, जो न्यायालय को लिखने होते हैं। धारा 393(1)(b), (c), और (d) में यह अनिवार्य किया गया है कि निर्णय में निम्नलिखित बातें स्पष्ट रूप से शामिल होनी चाहिए।
निर्णय के लिए निर्धारित बिंदु (Points for Determination)
न्यायालय को पहले यह तय करना होता है कि कौन-कौन से कानूनी प्रश्न (Legal Issues) मामले में उठ रहे हैं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति पर चोरी (Theft) का आरोप है, तो न्यायालय निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करेगा:
1. क्या अभियुक्त ने किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति बिना अनुमति के ले ली?
2. क्या यह कार्य जानबूझकर और बेईमानी से (Dishonestly) किया गया?
3. क्या चोरी किया गया सामान अभियुक्त के पास से बरामद हुआ?
निर्णय और उसका कारण (Decision and Reasons for the Decision)
न्यायालय को हर मुद्दे पर अपना निर्णय (Decision) देना होता है और यह भी बताना होता है कि उसने उस निर्णय पर पहुंचने का आधार क्या था।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी (Cheating) के अपराध में दोषी ठहराया जाता है, तो न्यायालय को यह स्पष्ट करना होगा कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने किस तरह से यह साबित किया कि अभियुक्त ने पीड़ित को धोखा देने की नीयत (Intention) से कार्य किया।
अपराध का उल्लेख और कानूनी धाराएं (Offense and Legal Provisions)
धारा 393(1)(c) के अनुसार, यदि अभियुक्त दोषी ठहराया जाता है, तो निर्णय में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए:
• अभियुक्त ने कौन सा अपराध (Offense) किया है।
• वह भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) की किस धारा (Section) के अंतर्गत दोषी है।
• उसे क्या दंड (Punishment) दिया गया है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) का दोषी पाया जाता है, तो निर्णय में यह स्पष्ट रूप से लिखा जाएगा कि उसे धारा 314 के तहत दोषी माना गया और उसे छह महीने की सजा और ₹5,000 का जुर्माना दिया गया।
यदि अभियुक्त को निर्दोष (Acquitted) घोषित किया जाता है, तो धारा 393(1)(d) के अनुसार:
• न्यायालय को यह स्पष्ट करना होगा कि अभियुक्त को किस अपराध से बरी किया गया है।
• यह भी आदेश देना होगा कि अभियुक्त को रिहा (Set Free) किया जाए।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति पर मारपीट (Assault) का आरोप है, लेकिन न्यायालय को कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, तो निर्णय में यह लिखा जाएगा कि अभियुक्त को धारा 123 के तहत आरोप से मुक्त कर दिया गया है।
संदेहपूर्ण मामलों में निर्णय (Doubtful Convictions)
कई बार यह स्पष्ट नहीं होता कि अपराध किस धारा के अंतर्गत आता है। ऐसे मामलों में धारा 393(2) यह कहती है कि न्यायालय को:
• अपना संदेह स्पष्ट रूप से दर्ज करना चाहिए।
• वैकल्पिक रूप से (In the Alternative) निर्णय देना चाहिए।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य पर तेजाब (Acid) डालता है, तो न्यायालय को यह तय करना होगा कि यह मामला गंभीर चोट (Grievous Hurt) में आता है या हत्या का प्रयास (Attempt to Murder) माना जाए। यदि संदेह हो, तो निर्णय में दोनों संभावनाएं दर्ज की जानी चाहिए।
मृत्युदंड या आजीवन कारावास का निर्णय (Death Sentence or Life Imprisonment)
यदि किसी अभियुक्त को मृत्युदंड (Death Sentence) या आजीवन कारावास (Life Imprisonment) दिया जाता है, तो धारा 393(3) के अनुसार न्यायालय को इसका विशेष कारण (Special Reasons) देना आवश्यक है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को हत्या (Murder) के मामले में मृत्युदंड दिया जाता है, तो न्यायालय को यह बताना होगा कि क्यों उसे आजीवन कारावास के बजाय मृत्युदंड दिया गया।
तीन महीने से कम की सजा होने पर कारण दर्ज करना (Recording Reasons for Lesser Punishment)
यदि किसी अपराध में एक वर्ष या उससे अधिक की सजा हो सकती है, लेकिन न्यायालय केवल तीन महीने से कम की सजा देता है, तो धारा 393(4) के अनुसार इसका कारण लिखना होगा।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अवैध घुसपैठ (Criminal Trespass) करता है, जिसके लिए एक वर्ष तक की सजा हो सकती है, लेकिन न्यायालय केवल एक माह की सजा देता है, तो उसे इसका कारण लिखना होगा, जैसे कि:
• अभियुक्त पहली बार अपराध कर रहा है।
• उसने गलती स्वीकार कर ली है।
• वह पहले से ही काफी समय हिरासत में (Custody) रह चुका है।
मृत्युदंड देने की प्रक्रिया (Execution of Death Sentence)
यदि किसी व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जाता है, तो धारा 393(5) के अनुसार निर्णय में यह स्पष्ट लिखा जाना चाहिए कि उसे फांसी (Hanging) दी जाएगी।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को आतंकवाद (Terrorism) और कई लोगों की हत्या के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो न्यायालय यह निर्देश देगा कि उसे तब तक फांसी दी जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 393 यह सुनिश्चित करती है कि हर निर्णय स्पष्ट, न्यायसंगत और कानूनी रूप से सही हो। इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि निर्णय में अपराध, धाराएं, कारण और सजा का विवरण सही ढंग से दिया जाए। यह प्रावधान न्याय व्यवस्था को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाता है ताकि प्रत्येक पक्ष को उचित न्याय मिल सके।