सरकारी देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: उदार रुख से सख्त जांच तक अपील में लापरवाही अब नहीं होगी माफ

Update: 2026-02-21 05:54 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा अपील दायर करने में होने वाली देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि देरी की माफी कोई अधिकार नहीं बल्कि अदालत का विवेकाधिकार है। अदालत ने ओडिशा सरकार द्वारा निर्धारित समयसीमा के भीतर अपील दाखिल न करने पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि प्रशासनिक शिथिलता और औपचारिक बहानों के आधार पर देरी को अब सहजता से माफ नहीं किया जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस. सी. शर्मा की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि पहले के वर्षों में अदालतें राज्यों द्वारा दायर अपीलों में देरी को न्यायोन्मुखी और उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए माफ कर देती थीं। खंडपीठ ने कलेक्टर, भूमि अधिग्रहण अनंतनाग बनाम मस्ट. कातिजी (1987) और जी. रामेगौड़ा बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी (1988) जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन निर्णयों में राज्य और निजी पक्षकार के बीच अंतर करते हुए राज्य के प्रति अपेक्षाकृत उदार रुख अपनाया गया।

हालांकि, अदालत ने माना कि पिछले डेढ़ दशक में इस दृष्टिकोण में स्पष्ट बदलाव आया। पोस्टमास्टर जनरल बनाम लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड (2012) में 427 दिनों की देरी को माफ नहीं किया गया। इसी प्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय बनाम भारत संघ (2020) में 916 दिनों की देरी को भी स्वीकार नहीं किया गया। इन निर्णयों से यह संकेत मिलता है कि अदालतें अब समयसीमा के कठोर पालन पर जोर दे रही हैं।

खंडपीठ ने आयुक्त संपत्ति कर बॉम्बे बनाम अमैच्योर राइडर्स क्लब, बॉम्बे (1994) के फैसले को क्लासिक उदाहरण बताया, जिसमें तत्कालीन प्रधान जस्टिस एम. एन. वेंकटचलैया ने राजस्व विभाग की देरी पर कड़ी टिप्पणी की थी।

उस निर्णय में कहा गया,

“यदि कोई सरकारी पक्षकार स्वयं नौकरशाही उदासीनता की बेड़ियों में जकड़ा हो तो अदालत भी उसकी सहायता नहीं कर सकती।”

वर्तमान मामले में ओडिशा सरकार ने राज्य शिक्षा अधिकरण के 2013 के आदेश को दो वर्ष की देरी से चुनौती दी थी। अधिकरण ने विद्यालय के शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को अनुदान जारी करने का निर्देश दिया, जिसे हाइकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसमें 123 दिनों की देरी हुई और दोष दूर कर पुनः दायर करने में 96 दिन और लग गए।

परिसीमा अधिनियम 1963 के अनुसार हाइकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध सामान्यतः 90 दिनों के भीतर अपील दायर करनी होती है, जब तक कि धारा 5 के अंतर्गत देरी माफ न की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य द्वारा प्रस्तुत कारण संतोषजनक नहीं हैं और यह स्पष्ट रूप से लापरवाही का मामला है।

खंडपीठ ने दो टूक कहा,

“देरी की माफी अधिकार के रूप में नहीं मांगी जा सकती। इसे माफ करना या न करना पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर है।”

अदालत ने पिछले वर्ष के शिवम्मा फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने हाइकोर्टों को चेतावनी दी थी कि वे सरकारी एजेंसियों की अत्यधिक देरी को केवल प्रशासनिक ढिलाई के आधार पर माफ न करें। उस मामले में कर्नाटक हाइकोर्ट द्वारा कर्नाटक आवास बोर्ड की 11 वर्ष की देरी को माफ करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था।

ताजा फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकारें और उनके विभाग समयसीमा के पालन में ढिलाई बरतकर न्यायिक सहानुभूति की अपेक्षा नहीं कर सकते। अदालत ने दोहराया कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है और प्रशासनिक उदासीनता को न्यायिक संरक्षण नहीं मिल सकता।

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