वक्फ ट्रिब्यूनल CPC के ऑर्डर XI के तहत इंटरोगेटरीज़ की इजाज़त दे सकता है: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल के पास पार्टियों को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर XI के तहत इंटरोगेटरीज़ (सवाल-जवाब) भेजने की इजाज़त देने का अधिकार है, क्योंकि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83(5) के तहत इसे सिविल कोर्ट माना जाता है।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा एस. की डिवीज़न बेंच ने केरल राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा दायर अपीलों पर यह फैसला सुनाया। इन अपीलों में वक्फ ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी जिनमें राज्य वक्फ बोर्ड को इंटरोगेटरीज़ भेजने की इजाज़त दी गई।
इंटरोगेटरीज़ सवालों का एक सेट होता है, जो सिविल मुकदमे में एक पार्टी दूसरी पार्टी को भेजती है ताकि कुछ बातों को स्वीकार करवाया जा सके और विवादित तथ्यों का दायरा कम किया जा सके।
कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या CPC के ऑर्डर XI नियम 1, जो स्पष्ट रूप से "किसी भी मुकदमे" में इंटरोगेटरीज़ की इजाज़त देता है, उसे वक्फ अधिनियम की धारा 83(2) के तहत मूल आवेदन में वक्फ ट्रिब्यूनल के सामने लागू किया जा सकता है, और क्या ऐसी अर्ज़ी पर दलीलें पूरी होने या लिखित बयान दाखिल होने से पहले विचार किया जा सकता है।
वक्फ बोर्ड ने तर्क दिया कि ऑर्डर XI केवल मुकदमों तक सीमित था और ये आवेदन समय से पहले थे क्योंकि दलीलें पूरी नहीं हुईं और मुद्दे तय नहीं किए गए। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने CPC की धारा 30 और वक्फ अधिनियम की धारा 83(5) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल के पास वही प्रक्रियात्मक शक्तियां हैं, जो सिविल कोर्ट के पास होती हैं।
कोर्ट ने गौर किया कि वक्फ अधिनियम की धारा 83(5) में कहा गया है कि वक्फ ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट माना जाता है और उसे वही शक्तियां प्राप्त हैं, जिनका इस्तेमाल सिविल कोर्ट CPC के तहत मुकदमा चलाने या डिक्री या आदेश को लागू करने के दौरान कर सकता है।
कोर्ट ने इस प्रावधान को CPC की धारा 30 के साथ पढ़ा, जो कोर्ट को किसी भी समय इंटरोगेटरीज़ भेजने और उनका जवाब देने, दस्तावेजों और तथ्यों को स्वीकार करने, और खोज और निरीक्षण से संबंधित आदेश देने का अधिकार देती है। अम्मू अम्मल बनाम वेंकिटाद्री अय्यर [1980 KLT 929] मामले का हवाला दिया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि CPC की धारा 30 कोर्ट को यह अधिकार देती है कि वह किसी भी समय - चाहे खुद से या किसी पक्ष की अर्ज़ी पर - इंटरोगेटरीज़ (सवाल-जवाब) देने और उनका जवाब देने से जुड़े सभी मामलों में ज़रूरी या उचित आदेश दे सके।
कोर्ट ने आगे कहा,
"इंटरोगेटरीज़ आमतौर पर विरोधी पक्ष को इसलिए भेजी जाती हैं ताकि अपने मामले को साबित करने में आसानी हो। इंटरोगेटरीज़ के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह जानकारी या स्वीकारोक्ति हासिल करने का एक ज़रिया है। इससे मुकदमेबाज़ी का समय कम होता है। कोड की धारा 30 यह अधिकार देती है, जिससे कोर्ट उस धारा में बताए गए आदेश 'किसी भी समय' दे सकता है। कोड की धारा 30 कोर्ट को यह अधिकार देती है, चाहे वह मुकदमा सुन रहा हो या किसी डिक्री का पालन (एक्ज़ीक्यूशन) करवा रहा हो।"
कोर्ट ने ऑर्डर XI नियम 1 की भी जांच की, जो कोर्ट की मंज़ूरी से इंटरोगेटरीज़ की इजाज़त देता है, बशर्ते वे विचाराधीन मामलों से संबंधित हों। ऑर्डर XI नियम 2 के तहत कोर्ट को केवल उन्हीं इंटरोगेटरीज़ की इजाज़त देनी चाहिए, जिन्हें वह कार्यवाही के निष्पक्ष निपटारे या खर्च बचाने के लिए ज़रूरी समझता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑर्डर XI नियम 1 में "मुकदमे" (suit) का ज़िक्र अकेले ही वक्फ ट्रिब्यूनल को धारा 83(5) के तहत स्पष्ट रूप से दिए गए प्रक्रियात्मक अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।
इसने यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम इब्राहिम उद्दीन [(2012) 8 SCC 148] मामले में सुप्रीम कोर्ट की इस बात का भी ज़िक्र किया कि ऑर्डर XI का मकसद ज़रूरी तथ्यों और स्वीकारोक्ति के बारे में जानकारी हासिल करके खर्च बचाना है, और विरोधी पक्ष के पास मौजूद दस्तावेज़ों या सामग्री की लंबी-चौड़ी जांच को रोकना है।
कोर्ट ने राज नारायण बनाम इंदिरा नेहरू गांधी [(1972) 3 SCC 850] मामले से यह सिद्धांत भी लिया कि इंटरोगेटरीज़ का "विचाराधीन मामलों" से काफ़ी हद तक सीधा संबंध होना चाहिए; जो सवाल क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) में प्रासंगिक हो सकते हैं, वे ज़रूरी नहीं कि इंटरोगेटरीज़ के तौर पर भी प्रासंगिक हों।
इस तरह कोर्ट ने माना कि वक्फ़ ट्रिब्यूनल द्वारा अपने सामने आए मामलों में 'इंट्रोगेटरीज़' (सवाल-जवाब की प्रक्रिया) की अनुमति देने में कोई गलती नहीं है, खासकर इसलिए क्योंकि ये सवाल निष्पक्ष सुनवाई के लिए ज़रूरी और प्रासंगिक पाए गए, और इन्हें परेशान करने वाला या अनावश्यक नहीं माना गया।
कोर्ट ने बोर्ड की इस दलील पर भी विचार किया कि कार्यवाही समय से पहले (Premature) शुरू की गई थी। विट्ठलभाई (पी) लिमिटेड बनाम यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया [(2005) 4 SCC 315] मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि समय से पहले कार्यवाही शुरू होने का मतलब यह नहीं है कि अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) पर ही सवाल उठ जाए, जब तक कि कोई कानूनी रोक न हो या कार्यवाही में अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कोई ऐसी कमी न हो, जिसे ठीक न किया जा सके।
इस प्रकार, कोर्ट ने माना कि वक्फ़ ट्रिब्यूनल ने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे में ही काम किया और चारों अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने केरल राज्य वक्फ़ बोर्ड को ट्रिब्यूनल के निर्देशों का पालन करते हुए 'इंट्रोगेटरीज़' का जवाब देने के लिए फ़ैसला मिलने की तारीख से एक महीने का समय दिया।
Case Title : The Kerala State Waqf Board v M.K. Venu and Ors. and connected cases