POCSO Act के तहत नाबालिग की योनि पर लिंग रखना 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' माना जा सकता है: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट, 2012' (POCSO Act) के तहत किसी नाबालिग की योनि पर लिंग रखना 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' (Penetrative Sexual Assault) की श्रेणी में आता है [2026 LiveLaw (Ker) 595]।
जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने कहा कि बच्चे के अंडरवियर को हटाकर उसकी योनि पर लिंग रखना, 'पेनिट्रेशन' (Penetration) का ही एक रूप माना जाएगा, जो 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' के अपराध के दायरे में आता है। उन्होंने आगे कहा कि यह केवल 'छूने' (Touching) जैसा नहीं है, जो POCSO Act की धारा 7 के तहत 'सेक्सुअल असॉल्ट' (Sexual Assault) का अपराध बनता है।
कोर्ट ने कहा,
"'छूने' (Touching) का अर्थ है 'किसी व्यक्ति को छूने पर उसके भीतर कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करना।' वहीं, 'रखने' (Placing) का अर्थ है 'किसी चीज़ को एक विशेष जगह या स्थिति में रखना', या 'किसी चीज़ को किसी खास शारीरिक स्थान पर टिकाना या संपर्क में लाना'। असल में, 'रखना' और 'छूना' एक ही चीज़ नहीं हैं। 'छूना' कुछ ही पल के लिए हो सकता है, जबकि 'रखना' (Placing) ज़्यादा देर तक बना रह सकता है... आरोपी ने बच्ची की योनि पर अपना लिंग रखा, जिसके तुरंत बाद उसे दर्द हुआ और वह रोने लगी। इससे पहले, आरोपी ने बच्ची का अंडरवियर हटा दिया था। ऐसे में इस हरकत को इतना हल्का नहीं माना जा सकता कि इसे केवल POCSO Act की धारा 7 के तहत परिभाषित 'छूना' (Touching) मान लिया जाए।"
कोर्ट एक ऐसे व्यक्ति की अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसे स्पेशल जज ने POCSO Act की धाराओं 3(a), 4(2), 5(m) और 6, तथा IPC की धारा 376AB के तहत दोषी ठहराया था।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उसने 3 साल की बच्ची के साथ 'पेनिट्रेटिव असॉल्ट' (Penetrative Assault) किया। उसे इन सभी अपराधों के लिए 20-20 साल की जेल और जुर्माने की सजा सुनाई गई। इस फैसले से असंतुष्ट होकर, वह हाई कोर्ट पहुंचा।
अपीलकर्ता ने बताया कि 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' (यौन प्रवेश वाला यौन हमला) के संबंध में विशेष अदालत का निष्कर्ष पूरी तरह से पीड़िता के बयान पर आधारित है। पीड़िता ने कहा कि अपीलकर्ता ने अपना लिंग उसकी योनि में डाला था। दलील दी गई कि योनि पर केवल लिंग रखना 'पेनिट्रेशन' (प्रवेश) नहीं माना जा सकता; यह योनि को छूने जैसा ही है।
उसने तर्क दिया कि इस मामले में 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' का अपराध नहीं बनता। अगर पीड़िता के बयान को सच माना जाए तो केवल POCSO Act की धारा 7 के तहत 'सेक्सुअल असॉल्ट' (यौन हमला) का अपराध बनता है, जिसके लिए धारा 8 के तहत अधिकतम 5 साल की सजा हो सकती है। अपीलकर्ता ने आगे कहा कि मेडिकल सबूतों से भी 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' का संकेत नहीं मिलता, क्योंकि डॉक्टर को कोई बाहरी चोट नहीं दिखी।
इस संबंध में 'लक्ष्मण जांगड़े बनाम छत्तीसगढ़ राज्य' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के निजी अंगों को छूना 'सेक्सुअल असॉल्ट' है, न कि 'रेप'। साथ ही 'कुट्टप्पन उर्फ बाबूकुट्टन बनाम केरल राज्य' मामले का भी जिक्र किया गया, जिसमें डिवीजन बेंच ने माना कि बच्चे की योनि में जननांग डालने की कोशिश करना 'रेप के प्रयास' (अटेम्प्ट टू रेप) के दायरे में आएगा।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़िता के बयान को पढ़ने से ही साफ हो जाता है कि अपीलकर्ता ने अपना लिंग उसकी योनि में डाला था, जिससे उसे दर्द हुआ। उन्होंने तर्क दिया कि इसमें थोड़ा-बहुत 'पेनिट्रेशन' (प्रवेश) हुआ है। उन्होंने 'रवींद्रन वी.एस. बनाम डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस' मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि 'लेबिया मेजोरा' (योनि के बाहरी होंठ) में थोड़ा सा भी प्रवेश 'रेप' या 'पेनाइल-वेजाइनल एंट्री' (योनि में लिंग का प्रवेश) माना जाएगा। उन्होंने 'नवाबुद्दीन बनाम उत्तराखंड राज्य' मामले का भी हवाला दिया।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने गौर किया कि स्पेशल जज ने पीड़िता (बच्ची) का 'वॉय डियर' (समझ-बूझ की जांच) टेस्ट किया और पाया कि वह बयान देने के लिए सक्षम है। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि बच्ची ने अपने बयान में कहा कि उसका अंडरवियर उतार दिया गया और अपीलकर्ता ने अपना लिंग उसकी योनि पर रखा, जिससे उसे दर्द हुआ और वह जोर से रो पड़ी। यह भी देखा गया कि वह जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान भी अपने बयान पर कायम रही।
इसके बाद कोर्ट ने गवाहों द्वारा पेश किए गए अन्य सबूतों पर गौर किया। फिर कोर्ट ने POCSO Act की धारा 3 और 7 की जांच की, जो क्रमशः 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' (Penetrative Sexual Assault) और 'सेक्सुअल असॉल्ट' (Sexual Assault) के अपराधों से संबंधित हैं।
मामले के तथ्यों और पेश किए गए सबूतों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने माना कि आरोपी/अपीलकर्ता का कृत्य 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' की श्रेणी में आता है, क्योंकि इसमें योनि के भीतर किसी भी हद तक प्रवेश (Penetration) या छेड़छाड़ शामिल थी। चूंकि पीड़िता की उम्र 12 साल से कम थी, इसलिए कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 5 (गंभीर 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट') के तहत अपराध भी बनता है। इसके बाद कोर्ट ने दोषसिद्धि (Conviction) के फैसले को बरकरार रखा।
सजा के संबंध में कोर्ट ने पाया कि स्पशेल जज ने POCSO Act की धारा 6 और IPC की धारा 376AB के तहत अपराधों के लिए सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि यह सजा POCSO Act की धारा 42 के खिलाफ है। इस धारा के अनुसार, जब किसी व्यक्ति पर IPC की धारा 376AB (या उसमें बताए गए अन्य प्रावधानों) और POCSO Act के तहत अपराधों का आरोप हो, तो दोनों में से जो भी सजा अधिक कठोर हो, वही दी जानी चाहिए।
इसके बाद कोर्ट ने IPC की धारा 376AB के तहत दी गई सजा रद्द किया और अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। वहीं, POCSO Act के प्रावधानों के तहत सुनाई गई सजा बरकरार रखी गई।
Case Title : Shaji v. State of Kerala