POCSO मामलों में उम्र साबित करने के लिए हर बार दस्तावेज जरूरी नहीं, यदि मौखिक गवाही को चुनौती न दी जाए: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि POCSO Act के तहत मामलों में यदि पीड़िता और उसकी मां द्वारा बताई गई उम्र को ट्रायल के दौरान चुनौती नहीं दी जाती, तो केवल दस्तावेजी प्रमाण के अभाव में दोषसिद्धि को खारिज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने यह फैसला एक आपराधिक अपील पर सुनाते हुए दिया, जिसमें आरोपी ने POCSO Act की धाराओं 7 और 8 तथा IPC की धारा 354 के तहत हुई अपनी सजा को चुनौती दी थी।
अभियोजन के अनुसार आरोपी एक अपार्टमेंट परिसर में सुरक्षा गार्ड था। उसने आठ वर्षीय बच्ची को कैमरा दिखाने के बहाने सुरक्षा कक्ष में ले जाकर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
अपील में आरोपी ने तर्क दिया कि अभियोजन पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम होने का आवश्यक तत्व साबित नहीं कर पाया, क्योंकि जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड या अन्य दस्तावेज पेश नहीं किए गए।
हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्यतः उम्र निर्धारण के लिए Juvenile Justice Act की धारा 94(2) के तहत दस्तावेजी साक्ष्य जैसे जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड या मेडिकल राय को प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि बचाव पक्ष ट्रायल के दौरान पीड़िता की उम्र पर विवाद ही नहीं उठाता और जिरह में इस पहलू को चुनौती नहीं देता, तो पीड़िता और उसकी मां की मौखिक गवाही पर्याप्त मानी जा सकती है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में पीड़िता और उसकी मां दोनों ने लगातार कहा कि घटना के समय बच्ची आठ वर्ष की थी और बचाव पक्ष ने जिरह के दौरान इस दावे को चुनौती नहीं दी। इसलिए यह मानने के लिए पर्याप्त आधार था कि पीड़िता POCSO Act के तहत “बालक” की श्रेणी में आती है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि एवं सजा को बरकरार रखा।