POSH Act के तहत संस्थान के निदेशक के खिलाफ भी आंतरिक शिकायत समिति कर सकती है जांच : केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी संस्थान का निदेशक उसके प्रशासन और प्रबंधन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रखता और वह कार्यकारी समिति द्वारा नियुक्त कर्मचारी की श्रेणी में आता है तो उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की जांच संस्थान की आंतरिक शिकायत समिति कर सकती है।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी गई।
मामला इंटीग्रेटेड रूरल टेक्नोलॉजी सेंटर के निदेशक से जुड़ा है। संस्थान की एक महिला कर्मचारी ने उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद आंतरिक शिकायत समिति ने उन्हें समन जारी किया। निदेशक ने इस समन को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
अदालत ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी द्वारा दूसरे कर्मचारी के खिलाफ शिकायत की जाती है, तो उसकी जांच आंतरिक शिकायत समिति करेगी। वहीं यदि शिकायत नियोक्ता के खिलाफ हो या समिति गठित न हो, तब स्थानीय समिति को जांच का अधिकार होगा।
खंडपीठ ने कहा कि संस्थान के संविधान और नियमों के संयुक्त अध्ययन से स्पष्ट है कि संस्थान के प्रशासन, नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार सामान्य निकाय और कार्यकारी समिति के पास है, निदेशक के पास नहीं।
अदालत ने कहा,
“निदेशक द्वारा संस्थान के कार्यों का प्रबंधन भी कार्यकारी समिति और सामान्य निकाय की निगरानी एवं नियंत्रण के अधीन है। साथ ही निदेशक की नियुक्ति भी कार्यकारी समिति द्वारा की जाती है। ऐसे में अपीलकर्ता को केवल कर्मचारी माना जाएगा और उसके खिलाफ शिकायत की जांच करने का अधिकार आंतरिक शिकायत समिति को है।”
निदेशक ने अदालत में दावा किया था कि शिकायत केवल उन्हें परेशान करने के उद्देश्य से की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आंतरिक शिकायत समिति की पीठासीन अधिकारी के साथ उनका हितों का टकराव है।
उन्होंने यह तर्क भी दिया कि चूंकि वह संस्थान के प्रमुख हैं, इसलिए वह नियोक्ता की श्रेणी में आते हैं और उनके खिलाफ शिकायत की जांच केवल स्थानीय समिति ही कर सकती है।
हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि निदेशक का अधिकार पूर्ण नहीं है और वह कार्यकारी समिति के नियंत्रण में काम करते हैं, इसलिए उन्हें नियोक्ता नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि समिति के गठन के करीब पांच महीने बाद निदेशक ने स्वयं एक आदेश जारी कर आंतरिक शिकायत समिति को भंग कर दिया था।
इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि यह कदम स्पष्ट रूप से अपीलकर्ता की ही रचना था।
]संस्थान की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता, जो समिति की सदस्य थी अपनी ही शिकायत की सुनवाई में शामिल नहीं होगी।
सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के फैसले में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है।
इसी के साथ अदालत ने अपील खारिज की।