बिना कारण अलग रहने की बात कहने पर आपसी सहमति से तलाक ठुकराया नहीं जा सकता : केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर आपसी सहमति से तलाक की याचिका खारिज नहीं की जा सकती कि पति-पत्नी ने अलग रहने का कोई कारण नहीं बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दोनों पक्ष विवाह समाप्त करने पर सहमत हैं, तो फैमिली कोर्ट को तलाक देने से इनकार नहीं करना चाहिए।
जस्टिस जे. निशा बानू और जस्टिस शोभा अन्नम्मा ईपेन की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसने आपसी सहमति से तलाक की संयुक्त याचिका खारिज की थी।
मामले में दंपति का विवाह मई, 2023 में रोमन कैथोलिक रीति-रिवाज से हुआ था। बाद में दोनों ने तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10ए के तहत आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने के लिए फैमिली कोर्ट में संयुक्त याचिका दायर की।
काउंसलिंग और वैधानिक अवधि पूरी होने के बाद दोनों पक्षों ने हलफनामा दाखिल कर तलाक की मांग दोहराई। हालांकि, सुनवाई के दौरान पति ने कहा कि दोनों “बिना किसी कारण” अलग रह रहे हैं। फैमिली कोर्ट ने जब उससे पूछा कि क्या वह पत्नी के साथ रहना चाहता है, तो उसने इस सवाल का जवाब नहीं दिया लेकिन तलाक लेने की इच्छा स्पष्ट रूप से जताई।
फैमिली कोर्ट ने इसे आपसी सहमति की कमी मानते हुए याचिका खारिज की। इसके खिलाफ पत्नी ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट को यह देखना चाहिए था कि विवाह वैध था दोनों ने संयुक्त याचिका दायर की और दोनों तलाक के लिए सहमत थे।
अदालत ने कहा,
“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि पति और पत्नी दोनों तलाक चाहते थे। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालने का कोई आधार नहीं था कि आपसी सहमति समाप्त हो गई।”
अदालत ने यह भी कहा कि पति द्वारा “बिना किसी कारण” अलग रहने की बात कहने या एक सवाल का जवाब न देने से यह नहीं माना जा सकता कि उसने अपनी सहमति वापस ली।
हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक अधिनियम की धारा 10ए के तहत अदालत का दायित्व यह जांचना है कि विवाह हुआ था, संयुक्त याचिका स्वेच्छा से दायर की गई और दोनों पक्ष तलाक के लिए तैयार हैं।
इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए दंपति का विवाह समाप्त घोषित कर दिया।