केरल हाईकोर्ट ने पति की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 के तहत अपनी पत्नी की सहमति के बिना उसका सोना गिरवी रखने के लिए आपराधिक विश्वासघात का दोषी पाया गया था।

जस्टिस ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने माना कि अपराध के सभी तत्व सिद्ध होते हैं।

कोर्ट ने कहा,

"इस मामले में अभियोजन पक्ष का तर्क यह है कि पीडब्लू1 की मां ने पीडब्लू1 को 50 सोने के आभूषण उपहार में दिए और पीडब्लू1 ने उन्हें ट्रस्टी के रूप में बैंक लॉकर में रखने के लिए आरोपी को सौंप दिया। आरोपी ने सोने के आभूषणों को बैंक लॉकर में रखने के बजाय बेईमानी से गबन किया और उस संपत्ति को मुथूट फिनकॉर्प में गिरवी रखकर अपने इस्तेमाल के लिए बदल लिया। इस तरह ट्रस्ट का उल्लंघन किया और पीडब्लू1 को उससे नुकसान उठाना पड़ा। इस प्रकार, इस मामले में IPC की धारा 406 के तहत अपराध को आकर्षित करने के लिए तत्व पूरी तरह से तैयार किए गए। ऐसे मामले में यह मानने का कोई कारण नहीं है कि आरोपी ने IPC की धारा 406 के तहत दंडनीय अपराध किया।"

अभियोजन पक्ष का तर्क यह है कि आरोपी की पत्नी की मां ने अपनी बेटी को उसकी शादी के दौरान 50 सोने के आभूषण उपहार में दिए थे। पत्नी ने यह सोना अपने पति को सौंप दिया और उसे बैंक लॉकर में रखने के लिए कहा। आरोपी ने अपनी पत्नी की जानकारी के बिना सोने को एक वित्तीय कंपनी में गिरवी रख दिया।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए उसे 6 महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई। जब मामला अपील के माध्यम से सेशन कोर्ट के समक्ष आया तो न्यायालय ने 6 महीने के साधारण कारावास के अतिरिक्त आरोपी को 5,00,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया, जो उसकी पत्नी को दिया जाएगा।

आरोपी ने इस निष्कर्ष को चुनौती देते हुए कहा कि साक्ष्यों से अपराध सिद्ध नहीं होता।

न्यायालय ने पाया कि पति को सोना सौंपा गया, जिसे उसने बेईमानी से गबन कर लिया और अपने उपयोग में ले लिया, जिससे उसकी पत्नी का विश्वास भंग हुआ और उसे नुकसान हुआ। न्यायालय ने माना कि आपराधिक विश्वासघात का अपराध पूर्ण रूप से सिद्ध है। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

केस टाइटल: सुरेन्द्र कुमार बनाम केरल राज्य

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