भरण-पोषण नहीं देना आर्थिक उत्पीड़न, यह भी घरेलू हिंसा में आता है: केरल हाईकोर्ट

Update: 2026-07-28 06:34 GMT

केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पति द्वारा पत्नी और बच्चे का भरण-पोषण नहीं करना आर्थिक उत्पीड़न है और यह महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है।

जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें एक पति ने पत्नी और नाबालिग बेटी को भरण-पोषण देने संबंधी निचली अदालतों के आदेश को चुनौती दी थी।

मामला घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत दायर याचिका से जुड़ा है। चित्तूर की न्यायिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट अदालत ने सुनवाई के बाद माना कि पत्नी घरेलू हिंसा की शिकार हुई। अदालत ने पति को पत्नी और नाबालिग बेटी को 10-10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने तथा मानसिक पीड़ा के लिए 2 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

बाद में पलक्कड़ की सेशन कोर्ट ने भी पति की अपील खारिज करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पति की ओर से दलील दी गई कि निर्धारित भरण-पोषण राशि अत्यधिक है। उसका कहना था कि पत्नी शिक्षित है और एक निजी कॉलेज में अध्यापन कर चुकी है, इसलिए वह अपना खर्च स्वयं उठा सकती है। उसने यह भी तर्क दिया कि घरेलू हिंसा के आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है।

वहीं, पत्नी ने अदालत को बताया कि बढ़ती महंगाई को देखते हुए निर्धारित भरण-पोषण राशि भी बहुत अधिक नहीं है। उसने कहा कि उसकी नौकरी केवल कुछ समय के लिए और मामूली वेतन पर थी। पति पर कानूनी रूप से उसका और बेटी का भरण-पोषण करने का दायित्व है।

हाईकोर्ट ने पति की दलीलें खारिज करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा की घटनाएं सामान्यतः घर की चारदीवारी के भीतर होती हैं। इसलिए हर मामले में स्वतंत्र गवाह या अलग से पुष्टिकरण की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

अदालत ने पाया कि पत्नी ने लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, अपने सोने के आभूषणों के दुरुपयोग, पति के कथित विवाहेतर संबंध को लेकर उत्पीड़न तथा अलग रहने के बाद भरण-पोषण नहीं मिलने की बात कही। जिरह के दौरान भी उसके बयान कमजोर नहीं पड़े।

हाईकोर्ट ने कहा कि पति ने स्वयं यह दावा भी नहीं किया कि उसने अलग रहने के बाद पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए कोई राशि दी थी। ऐसे में भरण-पोषण नहीं देना अपने आप में आर्थिक उत्पीड़न है, जो घरेलू हिंसा का एक रूप है।

अदालत ने कहा,

"यह निर्विवाद है कि भरण-पोषण का भुगतान न करना अपने आप में आर्थिक उत्पीड़न है और यह निश्चित रूप से घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है। इसलिए यह साबित करने के लिए किसी अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है कि पत्नी घरेलू हिंसा का शिकार हुई।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भरण-पोषण की राशि न्यायसंगत, उचित और पर्याप्त होनी चाहिए। इसे तय करते समय पक्षकारों की सामाजिक स्थिति, जीवन स्तर और वर्तमान समय में भोजन, वस्त्र, शिक्षा तथा मेडिकल जैसी आवश्यक जरूरतों पर होने वाले खर्च को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

अदालत ने माना कि पत्नी और नाबालिग बेटी को दी गई 10-10 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि वर्तमान महंगाई को देखते हुए किसी भी तरह से अत्यधिक नहीं कही जा सकती। साथ ही, पति यह भी साबित नहीं कर सका कि वह कमाने में असमर्थ है या शारीरिक रूप से काम करने योग्य नहीं है।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने पति की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।

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