POCSO Act | झूठे यौन उत्पीड़न के आरोप पर धारा 22 के तहत अभियोजन नहीं चलेगा: केरल हाइकोर्ट
केरल हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO Act की धारा 22 के तहत झूठी शिकायत के लिए अभियोजन केवल उन्हीं मामलों में चलाया जा सकता है, जहां झूठी सूचना अधिनियम की धारा 3, 5, 7 या 9 के अंतर्गत आने वाले गंभीर यौन अपराधों से संबंधित हो। केवल 'यौन उत्पीड़न' (धारा 12) से जुड़े कथित झूठे आरोप पर धारा 22 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।
जस्टिस सी. प्रतीप कुमार ने यह निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में दो व्यक्तियों के विरुद्ध POCSO Act की धारा 22 के अंतर्गत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन का आरोप था कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई कथित झूठी सूचना के आधार पर एक व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद यह सामने आया कि आरोपी द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया। इसके पश्चात याचिकाकर्ताओं को ही पॉक्सो अधिनियम की धारा 22 के तहत आरोपी बना दिया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जिस अपराध का आरोप मूल रूप से लगाया गया, वह POCSO Act की धारा 12 (यौन उत्पीड़न के लिए दंड) से संबंधित था न कि धारा 3, 5, 7 या 9 से। इसलिए धारा 22 के तहत उनके खिलाफ अभियोजन विधिसम्मत नहीं है।
हाइकोर्ट की टिप्पणी
हाइकोर्ट ने POCSO Act की धारा 22(1) का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह प्रावधान केवल उन मामलों पर लागू होता है, जहां किसी व्यक्ति के विरुद्ध जानबूझकर झूठी शिकायत धारा 3, 5, 7 या 9 के अंतर्गत आने वाले गंभीर यौन अपराधों के संबंध में की गई हो और उसका उद्देश्य अपमानित करना, डराना, धन वसूलना या बदनाम करना हो।
कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में दर्ज अपराध केवल धारा 12 के अंतर्गत था जो धारा 22 की परिधि में नहीं आता।
जस्टिस प्रतीप कुमार ने कहा,
“याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध अभियोजन जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इसलिए CrPC की धारा 482 के तहत इसे निरस्त किया जाना आवश्यक है।”
इन तथ्यों के आधार पर केरल हाइकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए याचिका स्वीकार की और याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।