कार्यपालक मजिस्ट्रेट की इन्क्वेस्ट रिपोर्ट केवल जांच में मदद करती है, पुलिस की अंतिम रिपोर्ट का विकल्प नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 174 के तहत तैयार की गई इन्क्वेस्ट रिपोर्ट, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 194 के अनुरूप है केवल तथ्यों का पता लगाने वाली रिपोर्ट होती है। इसका उद्देश्य जांच में सहायता करना है। यह न तो जांच प्रक्रिया को समाप्त करती है और न ही पुलिस की अंतिम रिपोर्ट का स्थान ले सकती है।
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने इस आधार पर पुलिस को जांच पूरी करने और सकलेशपुरा स्थित अतिरिक्त सिविल जज एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) की अदालत के समक्ष अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
मद्रास हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले मनोहारी बनाम जिला पुलिस अधीक्षक एवं अन्य (2018) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 174 के तहत तैयार की गई इन्क्वेस्ट रिपोर्ट फाइनल रिपोर्ट नहीं होती बल्कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री का हिस्सा होती है। इन्क्वेस्ट रिपोर्ट तैयार होने से पहले या उसके बाद FIR दर्ज किए जाने से उसकी वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता।
अदालत ने कहा कि इन्क्वेस्ट रिपोर्ट का उद्देश्य मृत्यु के प्रत्यक्ष और स्पष्ट कारण का पता लगाना है। इससे जांच समाप्त नहीं होती। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि इन्क्वेस्ट के बाद कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट का उद्देश्य पुलिस की जांच में सहायता करना मात्र है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन्क्वेस्ट की कार्यवाही से जांच अधिकारी की स्वतंत्र रूप से जांच करने की शक्ति प्रभावित नहीं होती। जांच पूरी होने के बाद अधिकारी के लिए CrPC की धारा 173(2) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष फाइनल रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य है।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“कार्यपालक मजिस्ट्रेट की इन्क्वेस्ट रिपोर्ट को CrPC की धारा 173(2) के तहत अपेक्षित अंतिम रिपोर्ट का विकल्प नहीं माना जा सकता और न ही इसे उसके बराबर माना जा सकता है।”
CrPC की धारा 174 के दायरे और प्रकृति को स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी को शव को परीक्षण के लिए निकटतम चिकित्सा अधिकारी के पास भेजना होता है। इसके साथ ही, शव पर मिले घावों, हड्डियों के टूटने और अन्य चोटों का विवरण तथा मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण दर्शाते हुए इन्क्वेस्ट रिपोर्ट तैयार करनी होती है।
राज्य सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट को इन्क्वेस्ट रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद कार्यवाही समाप्त हो जाती है, हाईकोर्ट ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट ने मनोहारी मामले में स्पष्ट रूप से माना है कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री में से केवल एक है। इससे न तो जांच समाप्त होती है और न ही यह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 173(2) के तहत निर्धारित फाइनल रिपोर्ट बन जाती है।
अदालत ने यह भी कहा कि यही सिद्धांत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 194 के तहत होने वाली कार्यवाही पर भी समान रूप से लागू होगा।
यह मामला 9 दिसंबर 2023 को संतोष नामक व्यक्ति की मृत्यु से जुड़ा था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उसे उचित और आवश्यक मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दिए जाने के कारण उसकी मौत हुई। इसके बाद CrPC की धारा 174 के तहत अप्राकृतिक मृत्यु रिपोर्ट (UDR) दर्ज की गई और 10 दिसंबर 2023 को कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने इन्क्वेस्ट की कार्यवाही की।
हालांकि इसके बाद पुलिस ने मजिस्ट्रेट के समक्ष कोई फाइनल रिपोर्ट दाखिल नहीं की। इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और पुलिस को मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देने की मांग की, ताकि वह इसके खिलाफ विरोध याचिका यानी प्रोटेस्ट पिटीशन दायर कर सके।
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए पुलिस को जांच पूरी करने और मजिस्ट्रेट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
इसके अलावा, अदालत ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि मद्रास हाईकोर्ट के मनोहारी फैसले की प्रति सभी जांच अधिकारियों को भेजी जाए। पुलिस महानिदेशक को इस निर्देश के अनुपालन की रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर अदालत में दाखिल करने को भी कहा गया।