'शादी में अब रुचि नहीं रही' कहकर पति तलाक नहीं मांग सकता, विवाह जीवनभर का संस्कार: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सिर्फ इस आधार पर कि पति की शादी में अब रुचि (Interest) नहीं रही, उसे तलाक नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह एक संस्कार (Sacrament) है, कोई अनुबंध (Contract) नहीं, इसलिए कोई भी व्यक्ति केवल यह कहकर वैवाहिक संबंध से अलग नहीं हो सकता कि अब उसका विवाह में मन नहीं है।
जस्टिस डी. के. सिंह और जस्टिस टी. एम. नदाफ की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पति को अपने ही गलत आचरण का लाभ (Take Advantage of His Own Wrong) नहीं दिया जा सकता।
क्या था मामला?
पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1A) के तहत तलाक की मांग की थी। उसका कहना था कि पत्नी के पक्ष में वैवाहिक सहवास की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) का डिक्री पारित होने के बावजूद दोनों के बीच वैवाहिक जीवन फिर शुरू नहीं हो सका। उसने पत्नी पर क्रूरता का आरोप भी लगाया था।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने पाया कि पति क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर सका और तलाक देने से इनकार कर दिया। इसके बाद पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पत्नी का पक्ष
पत्नी ने फैमिली कोर्ट में कहा कि उसने कभी अलग रहने की जिद नहीं की और न ही पति या उसके परिवार के साथ कोई झगड़ा किया। उसका कहना था कि वह वैवाहिक जीवन जारी रखने के लिए तैयार थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2003 में दोनों ने अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था और उनके एक बेटी है, जो अब लगभग बालिग हो चुकी है।
अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि पति ने जिरह के दौरान स्वयं स्वीकार किया था कि वह पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने में "रुचि नहीं रखता"।
इस पर अदालत ने कहा:
"जिस व्यक्ति ने प्रतिवादी से प्रेम विवाह किया, जिसके साथ उसका एक बच्चा है, वही अब यह कहकर अदालत आया है कि उसकी शादी में रुचि नहीं रही। हिंदू कानून के तहत विवाह एक संस्कार है, अनुबंध नहीं। इसलिए कोई व्यक्ति केवल रुचि खत्म होने के आधार पर विवाह से अलग नहीं हो सकता।"
खंडपीठ ने यह भी कहा कि पति अपने ही आचरण का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है, जिसे कानून अनुमति नहीं देता।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पति की अपील खारिज कर दी।