मंदिर के चढ़ावे पर विवाद: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा- आरती की थाली में आया चढ़ावा पुजारी की निजी आय, संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं
कर्नाटक हाईकोर्ट की कलबुर्गी बेंच ने कहा कि मंगल-आरती (पूजा-अनुष्ठान) की थाली में भक्तों द्वारा वंशानुगत अर्चक (मंदिर के पुजारी) को दिया गया चढ़ावा उनकी व्यक्तिगत आय है, जो 'हिंदू गेन्स ऑफ़ लर्निंग एक्ट, 1930' की धारा 3 के तहत सुरक्षित है और यह संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा नहीं है।
जस्टिस आर. नटराज और जस्टिस त्यागराज एन. इनावल्ली की डिवीजन बेंच ने कहा,
"भक्तों द्वारा अर्चक को दिया गया चढ़ावा वह पारिश्रमिक है, जो उन्हें पवित्र जीवन जीने और आगम शास्त्र में उनकी विद्वता, क्रियाओं और कैंकर्यों (सेवा कार्यों) में महारत, भजनों, मंत्रों और अनुष्ठानों को याद रखने, संबंधित धार्मिक ग्रंथों को समझने और उनका सही ढंग से पाठ करने तथा ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने आदि के लिए सम्मान के प्रतीक के रूप में मिलता है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"इसलिए ये चढ़ावे उस व्यक्ति की विद्या और ज्ञान की मान्यता के रूप में हैं। इसलिए इन्हें 'हिंदू गेन्स ऑफ़ लर्निंग एक्ट, 1930' की धारा 3 के तहत उनकी अपनी आय माना जाता है, न कि संयुक्त परिवार की आय।"
कोर्ट ने मंदिर को दिए जाने वाले चढ़ावे और पुजारी को दिए जाने वाले चढ़ावे के बीच भी अंतर स्पष्ट किया और कहा,
"इसलिए भक्तों द्वारा मंदिर को दिया गया कोई भी चढ़ावा पुजारी की आय नहीं बन सकता, बल्कि इसके विपरीत उसका हिसाब ट्रस्ट द्वारा रखा जाएगा। पुजारी केवल उसी चढ़ावे को घर ले जाने का हकदार है, जो भक्तों द्वारा मंगल-आरती की थाली में दिया जाता है।"
इस तर्क पर कि क्या मंगल-आरती की थाली में भक्तों द्वारा दिए गए चढ़ावे को संयुक्त परिवार की आय माना जा सकता है, कोर्ट ने कहा कि मंदिर के पुजारी के परिवार के सदस्य वंशानुगत अर्चक के कर्तव्यों का पालन कर भी सकते हैं और नहीं भी।
कोर्ट ने कहा,
"इसके बजाय, वह कोई दूसरा काम कर सकते हैं या फ्रीलांसिंग पुजारी (अर्चक) के तौर पर अपने परिवार के बाहर के लोगों के लिए धार्मिक रस्में निभा सकते हैं। ऐसी स्थिति में फ्रीलांसिंग या किसी दूसरे काम से होने वाली कमाई उनकी अपनी कमाई होगी। अगर कोई व्यक्ति परिवार की परंपराओं का सम्मान करते हुए देवता की सेवा में लगा रहता है और भक्त उसे नकद या किसी चीज़ के रूप में भेंट देते हैं तो ऐसी भेंट उस व्यक्ति की सेवा के सम्मान में दी गई मानी जाएगी। इसलिए इसे उसकी व्यक्तिगत आय माना जाना चाहिए।"
यह मामला स्वर्गीय कस्तूरीचंद की बेटियों द्वारा दायर संपत्ति बंटवारे के मुकदमे से जुड़ा है, जिन्हें हुंसी हाडगिल स्थित देवी पद्मावती जैन मंदिर में अर्चक का पद (पुजारी का काम) विरासत में मिला था। वादियों ने तीन तरह की संपत्तियों में हिस्सेदारी का दावा किया—वे संपत्तियां जो कस्तूरीचंद ने अपने नाम से खरीदी थीं, वे जो उनके बेटे चमलराव और बहू (पहली प्रतिवादी) के नाम पर थीं, और वे जो बहू के भाई के पास थीं।
वादियों ने तर्क दिया कि पूजा करने का अधिकार, जो कस्तूरीचंद को अपने पूर्वजों से विरासत में मिला, पूरे संयुक्त परिवार का है। इस प्रकार, बेटियों ने उन संपत्तियों में हिस्सेदारी का दावा किया, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे विरासत में मिले अधिकार से हुई आय से खरीदी गईं।
ट्रायल कोर्ट ने मुकदमे पर आंशिक रूप से फैसला सुनाते हुए संपत्तियों के बंटवारे की अनुमति दी, जिसमें बेटे और बहू के नाम वाली संपत्तियां भी शामिल हैं। इससे असंतुष्ट होकर, पहली प्रतिवादी और उनकी दो बेटियों ने हाईकोर्ट में अपील की।
इस मामले में हाईकोर्ट ने लक्ष्मी चंद खजुरिया और अन्य बनाम इशरू देवी (1977) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था, "विरासत में मिले पेशे से होने वाली आय संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं होगी।"
इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने कहा,
"इसलिए हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में श्री कस्तूरीचंद द्वारा देवी पद्मावती जैन मंदिर में एक वंशानुगत अर्चक के रूप में अर्जित आय उनकी व्यक्तिगत आय थी, न कि संयुक्त परिवार की आय।"
बेंच ने कहा कि पुजारी की अपनी कमाई से परिवार के दूसरे सदस्यों के नाम पर खरीदी गई कोई भी संपत्ति उन रिश्तेदारों की अपनी संपत्ति मानी जाएगी, न कि संयुक्त परिवार की संपत्ति।
कोर्ट ने कहा,
“चूंकि ये खरीदारी श्री कस्तूरीचंद की निजी आय से की गई थी, इसलिए श्री चमलराव और प्रतिवादी नंबर 1 के नाम पर खरीदी गई संपत्तियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता। इसलिए ये श्री चमलराव और प्रतिवादी नंबर 1 द्वारा खुद खरीदी गई संपत्तियां हैं, जिनमें वादियों का कोई हिस्सा नहीं है।”
कोर्ट ने संपत्तियों में अपना हिस्सा मांगने में वादियों की देरी पर भी ध्यान दिया, क्योंकि कस्तूरीचंद की मृत्यु 1982 में और चमलराव की 1986 में हुई। कोर्ट ने कहा कि इस देरी से पता चलता है कि वादियों को पता था कि ये संपत्तियां स्वतंत्र रूप से खरीदी गई निजी संपत्तियां थीं।
अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि कस्तूरीचंद द्वारा अपने नाम से खरीदी गई गैर-मंदिर वाली ज़मीन में वादियों को एक-तिहाई हिस्सा पाने का अधिकार है।
जिस ज़मीन पर मंदिर बना है, उसके बारे में कोर्ट ने कहा,
“जब तक हुंसी हाडगिल के सर्वे नंबर 6 पर देवी पद्मावती जैन मंदिर मौजूद है, तब तक वादी उस सर्वे नंबर में किसी भी हिस्से के हकदार नहीं होंगे।”
Case: RAJAMATI & OTHERS VS. LEELAVATHI & OTHERS