कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने कहा कि वक्फ बोर्ड वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर किसी वक्फ संस्था के प्रबंधन के लिए अपनी मर्जी से एड हॉक समिति नियुक्त नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने राज्य वक्फ बोर्ड की ओर से 11 महीने के लिए बनाई गई 11 सदस्यीय तदर्थ समिति से संबंधित कार्यालय ज्ञापन रद्द किया।

जस्टिस सचिन शंकर मगदुम ने मुडलगि की बज्मे तौहीद तंजीम समिति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

याचिका में वक्फ संस्था के प्रबंधन और निगरानी के लिए बोर्ड द्वारा तदर्थ समिति गठित करने के फैसले को चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि कर्नाटक वक्फ नियम, 2017 में मौजूदा प्रबंधन समिति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नई समिति के गठन की स्पष्ट व्यवस्था है। बोर्ड इस वैधानिक व्यवस्था को छोड़कर अपनी ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बना सकता।

जस्टिस मगदुम ने कहा,

“जब अधिनियम के तहत बनाए गए नियम यह निर्धारित करते हैं कि नई प्रबंधन समिति किस तरीके से गठित होगी और समिति गठित न होने की स्थिति में क्या व्यवस्था होगी, तो बोर्ड एड हॉक व्यवस्था का सहारा लेकर उस प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकता।”

अदालत ने 2017 के नियमों के नियम 54 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान बोर्ड को मौजूदा समिति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अपनी पसंद की कोई भी वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की खुली छूट नहीं देता। नियम में अंतरिम अवधि के दौरान प्रबंधन और निगरानी की जिम्मेदारी किस प्राधिकारी की होगी, यह भी निर्धारित किया गया और उसी प्राधिकारी पर नई समिति गठित कराने की जिम्मेदारी डाली गई।

मामले में पुरानी समिति का कार्यकाल 12 जून 2023 को समाप्त हो गया। हाईकोर्ट ने पाया कि इसके बाद बोर्ड ने नियमों के अनुसार नई समिति गठित करने के बजाय पहले बार-बार प्रशासक नियुक्त किया और बाद में एड हॉक समिति बना दी। यह समिति वक्फ मंत्री की सिफारिश पर 'विशेष मामले' के तौर पर गठित की गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम व्यवस्था का इस्तेमाल नियमित प्रबंधन समिति के गठन की वैधानिक प्रक्रिया को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

“एड हॉक समिति को नियमों में निर्धारित वैधानिक व्यवस्था का विकल्प नहीं बनने दिया जा सकता। यदि कानून में अंतरिम व्यवस्था की अनुमति है तो वह वास्तव में अंतरिम ही रहनी चाहिए और उसका इस्तेमाल नियमित प्रबंधन समिति के गठन की निर्धारित प्रक्रिया को विफल करने के लिए नहीं किया जा सकता।"

अदालत ने पाया कि विवादित कार्यालय ज्ञापन में 11 महीने के लिए तदर्थ समिति गठित की गई लेकिन हाईकोर्ट के पहले के निर्देशों के अनुसार नियमित समिति के गठन की प्रक्रिया पूरी करने का कोई पालन नहीं दिखाया गया। इसलिए यह महज रोजमर्रा के कामकाज को चलाने की प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी बल्कि नियम 54 के तहत निर्धारित व्यवस्था को हटाकर लंबे समय के लिए एक अलग प्रबंधन ढांचा खड़ा करने जैसा था।

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को सुनवाई योग्य माना

वक्फ बोर्ड की ओर से याचिका की सुनवाई का विरोध करते हुए कहा गया था कि वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। याचिकाकर्ताओं को पहले वक्फ अधिकरण का रुख करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होना हर स्थिति में हाईकोर्ट की रिट अधिकारिता पर रोक नहीं लगाता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के बोर्ड ऑफ वक्फ, पश्चिम बंगाल बनाम अनीस फातमा बेगम और आंध्र प्रदेश राज्य बनाम ए.पी. स्टेट वक्फ बोर्ड के फैसलों का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि जहां विवाद वक्फ अधिनियम के तहत अधिकरण के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अधिकार या स्वामित्व के विवाद से जुड़ा हो, वहां सामान्यतः अधिकरण का रुख किया जाना चाहिए। लेकिन यदि चुनौती स्वयं बोर्ड की कार्रवाई की वैधानिकता को लेकर हो और आरोप हो कि बोर्ड ने अनिवार्य कानूनी प्रावधान का उल्लंघन किया है, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी की या हाईकोर्ट के बाध्यकारी आदेशों की अवहेलना की है तो हाईकोर्ट अपनी असाधारण रिट अधिकारिता का इस्तेमाल कर सकता है।

मौजूदा मामले में याचिकाकर्ताओं ने बोर्ड द्वारा वैधानिक प्रक्रिया का पालन न करने और पहले प्रशासक तथा बाद में एड हॉक समिति नियुक्त करने को चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि उसके पहले के आदेशों में प्रशासक की नियुक्ति रद्द कर बोर्ड को प्रबंधन समिति गठित करने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने 11 सदस्यीय एड हॉक समिति गठित करने वाला विवादित कार्यालय ज्ञापन रद्द किया। साथ ही जिला वक्फ अधिकारी को वक्फ संस्था के प्रबंधन और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने का निर्देश दिया।

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