असहमति जताने के अधिकार के दायरे को स्पष्ट करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में 13 लोगों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की। इन लोगों पर आरोप था कि उन्होंने एक सार्वजनिक दीवार पर ऐसे नारे लिखे थे, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले की आलोचना की गई थी। [2026 LiveLaw (Kar) 425]

जस्टिस एच.पी. संदेश की सिंगल बेंच ने कहा कि किसी फैसले के प्रति केवल असंतोष जताना, देशद्रोह या समाज में अशांति फैलाने के बराबर नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"...ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संबंध में आवाज उठाई गई। इसमें केवल 'न्याय से वंचित करने' (Denial of Justice) की बात कही गई तथा न्याय की मांग की गई। ऐसी स्थिति में यह IPC की धारा 153A और 295A के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा [जावेद अहमद हजाम बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (2024) मामले के] फैसले में की गई चर्चा पर ध्यान देना चाहिए... हालांकि ये नारे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रति असंतोष जताते हैं, लेकिन धारा 153A लागू करने के लिए, राज्य के खिलाफ देशद्रोह (sedition) का तत्व होना जरूरी है..."

कोर्ट आरोपियों की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें 2019 में मंगलुरु दक्षिण पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR और उसके बाद की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई। यह FIR भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के जानबूझकर किए गए कृत्य) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत दर्ज की गई। इसके साथ ही इसमें 'कर्नाटक ओपन प्लेस डिसफिगरमेंट एक्ट, 1951' की धारा 3 भी लगाई गई।

यह FIR मंगलुरु दक्षिण पुलिस स्टेशन के असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर द्वारा स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए दर्ज कराई गई। इंस्पेक्टर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद, सड़क किनारे दीवारों पर कुछ नारे लिखे हुए पाए गए। आरोप है कि ये नारे आरोपियों ने ही लिखे थे।

इन नारों में कहा गया कि यह फैसला 'न्याय से इनकार' (Denial of Justice) है, और साथ ही 'न्याय के लिए आवाज़' उठाने की बात कही गई। पुलिस के मुताबिक, ये नारे 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया' (PFI) से जुड़े थे। इसे देखते हुए पुलिस ने यह आरोप लगाते हुए FIR दर्ज की कि इस हरकत का मकसद देश में अशांति या वैमनस्य फैलाना था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील इस्माइल मुनीब मुस्बा ने दलील दी कि दर्ज किए गए मामले या शिकायत में ऐसा कोई अपराध नहीं दिखता, जिसके आधार पर इन धाराओं को लागू किया जा सके।

संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि किसी फैसले से असहमति जताना न तो देशद्रोह है और न ही इससे समाज में किसी की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं।

'जावेद अहमद हजम' मामले का संदर्भ देते हुए याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कानून के दायरे में रहकर असहमति जताना लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(a) और 21 के तहत सुरक्षा मिली हुई।

इसके विपरीत राज्य पक्ष ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही याचिकाकर्ताओं ने प्रतिक्रिया दी और सार्वजनिक जगहों पर पोस्टर लगाए। उनका कहना था कि याचिकाकर्ताओं की इस हरकत से देश में अशांति फैल सकती थी।

दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद कोर्ट ने गौर किया कि शिकायत में केवल इतना कहा गया था कि यह फैसला 'न्याय से इनकार' है और इसमें 'न्याय के लिए आवाज़' उठाई गई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया,

"...अगर यही शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, तो ये IPC की धारा 153A और 295A के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं..."

इसलिए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले से केवल असंतोष जताना इस तरह के अपराध के दायरे में नहीं आता।

'जावेद अहमद हजम' मामले में तय किए गए सिद्धांतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि धारा 153A के तहत अपराध है या नहीं, यह इस बात से तय होता है कि उन शब्दों का आम तौर पर समझदार लोगों के एक बड़े समूह पर क्या असर पड़ता है।

अदालत ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा,

"सिर्फ इसलिए कि कुछ लोगों के मन में नफरत या दुर्भावना पैदा हो सकती है, यह IPC की धारा 153-A की उप-धारा (1) के खंड (a) को लागू करने के लिए काफी नहीं है।"

FIR रद्द करने की याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला,

"....सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई विस्तृत चर्चा और तय किए गए सिद्धांतों को देखते हुए यह CrPC की धारा 482 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके कार्यवाही रद्द करने का उपयुक्त मामला है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह केवल किसी फैसले के प्रति असहमति जताना है, न कि समाज में अशांति या वैमनस्य पैदा करना। इसमें केवल यह कहा गया है कि न्याय नहीं मिला और अपनी आवाज़ उठाई गई, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के दायरे में आता है…।"

Case Title : Yaseer Arafat & Ors. v. The State of Karnataka & Anr

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