पत्नी के चरित्र पर बेबुनियाद आरोप और बच्चे का पिता होने से इनकार करना वैवाहिक क्रूरता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के चरित्र (पवित्रता) पर सवाल उठाने वाले बेबुनियाद आरोप और उसके बच्चे का पिता होने से इनकार करना उसके चरित्र, सम्मान और प्रतिष्ठा पर गंभीर हमला है और यह वैवाहिक क्रूरता के दायरे में आता है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने पति की अपील खारिज की, जिसमें उसने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 27(1)(b) और 27(1)(d) के तहत क्रूरता और परित्याग (छोड़ देने) के आधार पर शादी खत्म करने से फैमिली कोर्ट के इनकार को चुनौती दी थी।
दोनों पक्षों ने 25 जून, 2008 को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी की थी। पति का आरोप था कि पत्नी ने 2009 में उसके खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराया, वैवाहिक घर छोड़ दिया और बार-बार अनुरोध करने के बावजूद साथ रहने से इनकार किया। उसने यह भी तर्क दिया कि दोनों पक्षों ने लगभग दस वर्षों से साथ नहीं रहा है, जो क्रूरता के बराबर है, और पत्नी ने बिना किसी सुलह की संभावना के उसे छोड़ दिया।
फैमिली कोर्ट ने यह पाते हुए तलाक की याचिका खारिज की कि पति क्रूरता या परित्याग साबित करने में विफल रहा। इसके बाद उसने अपील के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।
डिवीजन बेंच ने कहा कि वैवाहिक कानून के तहत क्रूरता शारीरिक या मानसिक, जानबूझकर या अनजाने में हो सकती है, और इसका आकलन वैवाहिक कर्तव्यों और दायित्वों के संदर्भ में किया जाना चाहिए। कोर्ट ने गौर किया कि दहेज से संबंधित उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए पत्नी की आपराधिक शिकायत के बाद वैवाहिक संबंध तनावपूर्ण हो गए। हालांकि, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह भी पता चला कि पति ने उसके चरित्र पर सवाल उठाए और उसके बेटे का पिता होने से इनकार किया था।
विजय कुमार रामचंद्र भाटे बनाम नीला विजय कुमार भाटे मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“शादी के बाहर किसी व्यक्ति के साथ अनुचित संबंध और एक्स्ट्रा-मैरिटल संबंध के घिनौने आरोप लगाना जीवनसाथी के चरित्र, सम्मान, प्रतिष्ठा और स्थिति पर गंभीर हमला है। इसलिए इस तरह के आरोप अपमान और क्रूरता का सबसे बुरा रूप हैं।”
बेंच ने पाया कि पति ऐसा कोई ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा, जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी ने उसके साथ क्रूरता की थी। कोर्ट ने पाया कि जिन हालात का ज़िक्र उसने किया, वे सिर्फ़ शादीशुदा ज़िंदगी में होने वाली आम उतार-चढ़ाव या दिक्कतों से जुड़े थे।
पत्नी को छोड़ने (डेज़र्शन) के मामले में कोर्ट ने देखा कि ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे पता चले कि पति ने पत्नी को वापस घर लाने की सच्ची कोशिश की हो। न तो उसने साथ रहने की इच्छा जताते हुए कोई नोटिस भेजा और न ही कोई ऐसी तारीख बताई जब वह कथित तौर पर उसे वापस लेने गया।
कोर्ट ने कहा:
“रिकॉर्ड पर ऐसा एक भी सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि वादी ने प्रतिवादी को वापस लाने की इच्छा जताते हुए कोई नोटिस भी भेजा हो।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि क्रूरता पत्नी की तरफ़ से नहीं, बल्कि पति के व्यवहार से हुई।
कोर्ट ने कहा:
“बल्कि, ऐसा लगता है कि क्रूरता उसकी तरफ़ से हुई, न कि प्रतिवादी की तरफ़ से; उसने पत्नी-प्रतिवादी और उसके बच्चे की देखभाल नहीं की और पत्नी-प्रतिवादी पर चरित्रहीनता के बेबुनियाद आरोप लगाए। साथ ही उसके बेटे का पिता होने से भी इनकार किया।”
फ़ैमिली कोर्ट द्वारा मौखिक और दस्तावेज़ी सबूतों के मूल्यांकन में कोई गड़बड़ी न पाते हुए हाईकोर्ट ने तलाक की अर्ज़ी खारिज करने के फ़ैसले को सही ठहराया और अपील खारिज की।
Case Title: Manoj Kumar Hansda v. Varsha Monigini Hembrom.