झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त परिवार की संपत्ति का मौखिक बंटवारा लिखित दस्तावेज के अभाव में भी मौखिक साक्ष्य और लंबे समय से चले आ रहे अलग-अलग कब्जे के आधार पर साबित किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि यदि पक्षकार कई दशकों से अपने-अपने हिस्से की संपत्ति पर अलग-अलग कब्जा रखते हुए उसका उपयोग और उपभोग कर रहे हैं तो मौखिक बंटवारे को स्वीकार किया जा सकता है।

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने यह टिप्पणी रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में संताल परगना प्रमंडल, दुमका के आयुक्त द्वारा 6 जुलाई 2007 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। आयुक्त ने याचिकाकर्ताओं की पुनर्विचार याचिका खारिज की। इससे पहले 8 जनवरी 2007 को उन्होंने बंटवारे से जुड़े मामले में निचली राजस्व अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा।

याचिकाकर्ताओं ने 1975 में बंटवारा वाद दायर कर वादपत्र की अनुसूची 'बी' में दर्ज जमीनों के बंटवारे की मांग की थी। ये जमीनें दुमका जिले के सरदारी सर्किल बासुकीनाथ स्थित मौजा कन्हैयापुर नंबर 33 में थीं।

पक्षकार साझा पूर्वजों के वंशज थे। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि विवादित जमीनें गैंटजर बंदोबस्त पर्चे में उनके पूर्वजों के नाम संयुक्त रूप से दर्ज थीं। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने कहा कि जमीन का मौखिक बंटवारा पहले ही हो चुका था और सभी पक्षकार अपने-अपने हिस्से पर अलग-अलग कब्जे में थे।

यह बंटवारा वाद 1872 के विनियम 3 के तहत सहायक बंदोबस्त अधिकारी, दुमका के समक्ष भेजा गया। 28 अक्टूबर 1983 को सहायक बंदोबस्त अधिकारी ने यह मानते हुए वाद खारिज कर दिया कि पक्षकारों के बीच पहले ही बंटवारा हो चुका था।

इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने प्रभारी अधिकारी, दुमका के समक्ष अपील दायर की। 22 अगस्त 1987 को अपील खारिज की गई और सहायक बंदोबस्त अधिकारी का निष्कर्ष बरकरार रखा गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने संताल परगना प्रमंडल के आयुक्त के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसे 8 जनवरी 2007 को खारिज किया गया। पुनर्विचार याचिका भी 6 जुलाई 2007 को खारिज होने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट राजीव शर्मा ने दलील दी कि संबंधित अधिकारियों ने दस्तावेजी साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और केवल मौखिक साक्ष्य के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि जमीन का बंटवारा पहले ही हो चुका था। उन्होंने इन आदेशों को रद्द करने की मांग की।

राज्य की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारियों ने गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया। तीनों स्तरों पर एक समान निष्कर्ष दर्ज किया गया और ऐसे में हाईकोर्ट द्वारा साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करने का कोई आधार नहीं है।

हाईकोर्ट ने पाया कि सहायक बंदोबस्त अधिकारी ने प्रतिवादियों की इस दलील पर विचार किया कि बांध और कुंड को छोड़कर बाकी कोई भी संपत्ति 10 मई 1977 से संयुक्त कब्जे में नहीं थी। बांध और कुंड का उपयोग संयुक्त रूप से जारी था, जबकि बाकी संपत्तियों का बंटवारा गैंटजर बंदोबस्त से पहले ही हो चुका था।

अदालत ने कहा कि भले ही बंटवारे का कोई लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं था, लेकिन गवाहों के बयानों से यह साबित हुआ कि बांध और कुंड को छोड़कर बाकी संपत्तियां पहले ही अलग-अलग हिस्सों में बंट चुकी थीं और पक्षकार अपने-अपने हिस्से का अलग-अलग इस्तेमाल कर रहे थे।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि वादियों ने सहायक बंदोबस्त अधिकारी के समक्ष स्वीकार किया था कि सभी पक्षकार रैयत हैं और अपने-अपने हिस्से की संपत्तियों का अलग-अलग उपयोग कर रहे हैं। यह व्यवस्था उनके बुजुर्गों द्वारा किए गए समझौते के आधार पर 50 साल से अधिक समय से चली आ रही थी।

प्रभारी अधिकारी ने भी गवाहों के साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए पाया कि वादी पक्ष ने यह स्वीकार किया था कि गैंटजर सर्वे बंदोबस्त से पहले से ही सभी पक्षकार अलग-अलग रह रहे थे।

आयुक्त ने दस्तावेजी और मौखिक दोनों साक्ष्यों की जांच की थी। उन्होंने पाया कि याचिकाकर्ता यह स्पष्ट नहीं कर सके कि कौन-सी संपत्ति पर किस प्रतिवादी पक्ष का कब्जा था। ऐसी स्थिति में बंदोबस्त पर्चे के टिप्पणी वाले कॉलम में दर्ज विवरण पक्षकारों के अलग-अलग कब्जे को साबित करने के लिए पर्याप्त था।

हाईकोर्ट ने कहा कि तीनों संबंधित अधिकारियों ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद एक समान निष्कर्ष दिया। इसलिए रिट अदालत के रूप में हाईकोर्ट के लिए साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा।

अदालत ने यह भी माना कि मौखिक बंटवारे को मौखिक साक्ष्य के आधार पर साबित किया जा सकता है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के 'काले' मामले में दिए गए फैसले से भी सहायता मिलती है।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने निचली राजस्व अदालतों और आयुक्त के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और रिट याचिका खारिज की।

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