झारखंड हाईकोर्ट ने ई-कार्ट लॉजिस्टिक्स के एक अधिकारी और फ्लिपकार्ट की सुरक्षा टीम के सदस्य के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शिपमेंट की कथित गैर-वापसी के मामले में संपत्ति की सुपुर्दगी व्यक्तिगत कर्मचारियों को नहीं, बल्कि फ्लिपकार्ट कंपनी को की गई थी। इसलिए कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात का अपराध नहीं बनता।

जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने धारा 482 CrPC के तहत दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए FIR, चार्जशीट और दोनों आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेने के आदेश को रद्द कर दिया।

क्या था मामला?

शिकायतकर्ता की कंपनी कई वर्षों से फ्लिपकार्ट प्लेटफॉर्म पर विक्रेता के रूप में कारोबार कर रही थी। आरोप था कि ई-कार्ट लॉजिस्टिक्स के माध्यम से भेजे गए कई शिपमेंट वापस नहीं किए गए।

शिकायत के अनुसार, फ्लिपकार्ट ने इन शिपमेंट की डिलीवरी के डिजिटल प्रमाण उपलब्ध कराए, लेकिन उनके भौतिक प्रमाण पेश नहीं किए। कुल 19 शिपमेंट, जिनकी कीमत करीब ₹1.06 लाख थी, कंपनी को प्राप्त नहीं हुए। इसके अलावा 19 शिपमेंट का करीब ₹56,649.70 में निपटारा किया गया, जिससे शिकायतकर्ता ने कुल लगभग ₹1.63 लाख के नुकसान का आरोप लगाया।

मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं पर शिकायतकर्ता और उसके कर्मचारियों से कथित तौर पर अभद्रता और धमकी देने के आरोप भी लगाए गए थे।

धारा 406 IPC पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

पुलिस जांच के बाद दोनों के खिलाफ धारा 406 और 420 IPC के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी और 14 अक्टूबर 2020 को मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक विश्वासघात (धारा 406 IPC) के लिए जरूरी है कि संपत्ति आरोपी को सौंपी गई हो।

कोर्ट ने पाया कि मामले में ऐसी कोई शिकायत नहीं थी कि संपत्ति दोनों याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से सौंपी गई थी। कथित सुपुर्दगी फ्लिपकार्ट और शिकायतकर्ता कंपनी के बीच हुए व्यावसायिक समझौते के तहत थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिक से अधिक संपत्ति की सुपुर्दगी फ्लिपकार्ट को मानी जा सकती है, इन दोनों कर्मचारियों को नहीं।

धोखाधड़ी का अपराध भी नहीं बना

धारा 420 IPC के संबंध में कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि दोनों कर्मचारियों ने शिकायतकर्ता को किसी झूठे या भ्रामक बयान से धोखा दिया या बेईमानी से उसे संपत्ति देने के लिए प्रेरित किया।

कोर्ट ने कहा कि केवल शिपमेंट के वापस न मिलने के आरोपों से, बिना आवश्यक तत्व साबित किए, धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता।

आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों आरोपियों के खिलाफ धारा 406 और 420 IPC के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं।

ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

इसके बाद कोर्ट ने दोनों आरोपियों के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही, डोरंडा थाना केस संख्या 408/2019 और 14 अक्टूबर 2020 के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।

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