'फ्रेंडली लोन' अपने आपमें NI Act की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज़ नहीं बनता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में दो आरोपियों को बरी करने का फैसला सही ठहराते हुए कहा कि पक्षों के बीच "दोस्ताना लेन-देन" अपने आप में Negotiable Instruments Act (NI Act) की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज़ नहीं बन जाता।
जस्टिस राजेश कुमार की एकल पीठ शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें जमशेदपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी द्वारा 28.07.2008 को Complaint C-1 Case No. 807 of 2007 में दिए गए फैसले को चुनौती दी गई।
शिकायतकर्ता के अनुसार, उसने 03.01.2007 को आरोपी को उसके कारोबार में मदद करने के लिए 2 लाख रुपये का दोस्ताना लोन दिया था (1 लाख रुपये चेक के ज़रिए और 1 लाख रुपये नकद)। आरोप लगाया गया कि इसके बदले में आरोपी ने सुरक्षा के तौर पर 1.5 लाख रुपये और 50,000 रुपये के दो पोस्ट-डेटेड चेक शिकायतकर्ता को सौंपे थे।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि जब चेक बैंक में जमा किए गए तो वे खाते में पर्याप्त पैसे न होने के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद पैसे चुकाने की मांग करते हुए कानूनी नोटिस भेजा गया, जिसके बाद NI Act की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई।
मुकदमे के बाद मजिस्ट्रेट ने आरोपियों को बरी कर दिया, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
मुकदमे के दौरान, शिकायतकर्ता ने खुद को CW-1 के तौर पर पेश किया और बयान दिया कि यह रकम दोस्ताना लोन के तौर पर दी गई और आरोपी ने अपने हाथों से लिखकर उसके नाम पर चेक जारी किए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि NI Act की धारा 138 को व्यावसायिक लेन-देन को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया। कोर्ट ने आगे कहा कि हालांकि चेक धारक के पक्ष में एक कानूनी अनुमान (statutory presumption) मौजूद होता है, लेकिन इस अनुमान को तब गलत साबित किया जा सकता है, जब रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत यह दर्शाते हों कि वहां कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज़ मौजूद नहीं था।
कोर्ट ने कहा:
"दोस्ती को किसी कॉन्ट्रैक्ट का आधार या प्रतिफल (Consideration) नहीं माना जा सकता।"
बेंच ने आगे कहा:
“अतः, यदि कोई अनुबंध नहीं बना है तो उस लेन-देन को कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता; वह 'कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले ऋण' की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता और उस पर NI Act की धारा 138 का क्षेत्राधिकार लागू नहीं होता।”
न्यायालय ने यह पाया कि विचाराधीन लेन-देन को स्वयं शिकायतकर्ता ने 'मित्रतापूर्ण ऋण' (Friendly Loan) के रूप में वर्णित किया था। यह निर्णय दिया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए दोषमुक्ति के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है।
तदनुसार, दोषमुक्ति के विरुद्ध दायर अपील खारिज कर दी गई।
Case Title: Md. Masudul Haque Ansari v. State of Jharkhand and Ors.