शादी से इनकार करने पर 7 साल के आपसी सहमति वाले रिश्ते को रेप नहीं माना जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर दो बालिगों के बीच सात साल से ज़्यादा समय तक शारीरिक संबंध रहे हों, और इस बात का कोई ठोस आरोप न हो कि शादी का वादा करते समय पुरुष का इरादा शादी करने का नहीं था, तो ऐसे आरोपों से ज़्यादा से ज़्यादा आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध का ही पता चलता है; इसे शादी के झूठे वादे पर रेप नहीं माना जा सकता।
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) के तहत रेप के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही (जिसमें FIR और संज्ञान लेने का आदेश भी शामिल था) रद्द कर रहे थे। कोर्ट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर आपराधिक विविध याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में महिला (सदर) थाना केस नंबर 12/2023 (जो G.R. नंबर 1945/2024 से संबंधित है) और गिरिडीह के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 16 अगस्त 2024 को पारित संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग की गई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता की मुलाकात शिकायतकर्ता से 2016 में एक दोस्त की शादी में हुई। दोनों ने मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान किया और बाद में उनके बीच संबंध बन गए। आरोप था कि याचिकाकर्ता गिरिडीह रेलवे स्टेशन के पास शिकायतकर्ता से मिलता और बात करता था और शादी का वादा करके उसका यौन शोषण करता था। इसके बाद भी उनके संबंध जारी रहे।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 20 दिसंबर 2022 को याचिकाकर्ता उसे रांची ले गया और 21 दिसंबर 2022 को एक होटल में रखा, जहां उसने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। उसने आरोप लगाया कि सात साल से ज़्यादा समय तक उसका यौन शोषण करने और उसकी ज़िंदगी बर्बाद करने के बाद याचिकाकर्ता ने रिश्ता खत्म कर दिया। 2 अप्रैल 2023 को उसने कथित तौर पर अपना मोबाइल फोन बंद कर लिया। जब शिकायतकर्ता ने उसके पिता से संपर्क किया तो याचिकाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों ने कथित तौर पर उसके साथ बदसलूकी की और याचिकाकर्ता के साथ उसकी शादी के लिए सहमत होने से इनकार किया।
उसकी लिखित रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने IPC की धारा 376(2)(n) के तहत अपराध का संज्ञान लिया।
हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जब 2016 में रिश्ता शुरू हुआ, तब शिकायतकर्ता बालिग थी और शारीरिक संबंध सात साल से अधिक समय तक चले। यह भी कहा गया कि FIR तब दर्ज की गई जब याचिकाकर्ता और उसके परिवार ने कथित तौर पर शादी करने से इनकार किया, जिससे यह साबित होता है कि दोनों बालिगों के बीच रिश्ता आपसी सहमति से था।
हाईकोर्ट ने जांच की कि क्या आरोपों से शादी का झूठा वादा पता चलता है, जिससे महिला की सहमति अमान्य हो सकती है। बेंच ने प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि शादी का वादा तभी झूठा वादा माना जाएगा, जब वादा करने वाले का उसे पूरा करने का कोई इरादा न हो।
हाईकोर्ट ने कहा:
“जहां शादी का वादा झूठा हो और वादा करते समय ही वादा करने वाले का इरादा उसे पूरा करने का न हो, बल्कि महिला को धोखा देकर शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी करना हो, तो वहां 'तथ्य की गलतफहमी' (Misconception of Fact) होती है जो महिला की 'सहमति' को अमान्य कर देती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वादे को केवल तोड़ना झूठा वादा नहीं माना जा सकता, और झूठा वादा साबित करने के लिए, वादा करने वाले का वादा करते समय ही अपनी बात पर कायम न रहने का इरादा होना चाहिए।
इस सिद्धांत को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ता का शुरू से ही शिकायतकर्ता से शादी करने का इरादा नहीं था, जब उसने उससे शादी करने का वादा किया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह निर्विवाद बात है कि याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच शारीरिक संबंध बिना किसी विरोध के सात साल से अधिक समय तक चले और FIR तब दर्ज की गई, जब याचिकाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों ने कथित तौर पर शादी करने से इनकार कर दिया।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने कहा:
“ऐसी परिस्थितियों में यह कोर्ट यह कहने में कोई संकोच नहीं करता कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए सभी आरोप, भले ही उन्हें पूरी तरह सच मान लिया जाए तो भी वे ज़्यादा-से-ज़्यादा पार्टियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध का मामला ही बताते हैं और IPC की धारा 376 (2)(n) के तहत दंडनीय अपराध बनाने के लिए अपर्याप्त हैं।”
यह मानते हुए कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, हाईकोर्ट ने FIR और 16 अगस्त, 2024 के संज्ञान आदेश सहित पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द किया।
Case Title: Lalu Mahtha @ Lalu Mahta v. State of Jharkhand and Anr.