सिर्फ़ गाली देना या जाति का नाम लेना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(1)(s) के तहत अपराध साबित होने के लिए यह काफ़ी नहीं कि आरोपी सिर्फ़ किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को गाली दे या सिर्फ़ जाति का नाम ले। कोर्ट ने साफ़ किया कि ज़रूरी शर्त यह है कि आरोपी किसी सार्वजनिक जगह पर, जहाँ लोग देख सकें, ऐसे सदस्य को "जाति के नाम से" गाली दे।
जस्टिस राजेश सेखरी की बेंच ने टिप्पणी की,
"...ऊपर कही गई बातों से यह साफ़ है कि सिर्फ़ किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को गाली देना या सिर्फ़ जाति का नाम लेना, अपने आप में इस एक्ट की धारा 3(1)(s) के तहत अपराध मानने के लिए काफ़ी नहीं होगा। इसके लिए यह ज़रूरी है कि आरोपी किसी सार्वजनिक जगह पर, जहाँ लोग देख सकें, ऐसे समुदाय के सदस्य को 'जाति के नाम से' गाली दे।"
कोर्ट एक मिली-जुली याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत SC/ST Act की धारा 14A(2) के साथ मिलाकर दायर किया गया। यह याचिका कास्तीगढ़ की ज़िला विकास परिषद (DDC) की एक सदस्य ने दायर की थी। याचिका में भादेरवाह के प्रिंसिपल सेशंस जज (विशेष जज) के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें डोडा पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के सिलसिले में उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी खारिज की गई थी। यह FIR SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के साथ-साथ BNS की धारा 126(2), 115(2), 351(2), 352 के तहत अपराधों के लिए दर्ज की गई थी।
जनवरी, 2026 में प्रतिवादी नंबर 2 (शिकायतकर्ता) ने डोडा पुलिस स्टेशन में लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कास्तीगढ़ में एक सड़क के उद्घाटन समारोह के दौरान—जहां डोडा के MLA, DDC चेयरमैन और DDC वाइस चेयरपर्सन मुख्य अतिथियों के तौर पर मौजूद थे—याचिकाकर्ता के बेटों ने, याचिकाकर्ता और उनके समर्थकों की मिलीभगत से शिकायतकर्ता और वहां मौजूद अन्य लोगों पर हमला कर दिया।
आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता संतोष देवी के पास एक धारदार हथियार (एक कैंची) था, जिससे उसने शिकायतकर्ता पक्ष को चोटें पहुंचाईं। शिकायतकर्ता ने विशेष रूप से आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक रूप से उसे गाली दी, अपमानित किया और बेइज्ज़त किया। साथ ही जाति-आधारित अपमानजनक शब्द "चिनल" का इस्तेमाल किया; जबकि उसे पूरी तरह पता था कि वह 'मेघ' समुदाय से संबंधित है, जो एक अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) श्रेणी है।
ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ज़मानत याचिका को मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज किया कि, चूंकि उसने सार्वजनिक नज़र में एक अनुसूचित जाति के सदस्य के लिए "चिनल" शब्द का इस्तेमाल किया, इसलिए SC/ST Act के तहत अपराधों के प्रथम दृष्टया (Prima Facie) तत्व बनते थे, जिससे एक्ट की धारा 18 और 18A के तहत रोक लागू हो गई।
कोर्ट की टिप्पणी:
कोर्ट ने SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के प्रावधानों की जांच की। धारा 3(1)(r) किसी भी सार्वजनिक स्थान पर, जो लोगों की नज़र में हो, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को अपमानित करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करने या डराने-धमकाने के लिए दंडित करती है। धारा 3(1)(s) किसी भी सार्वजनिक स्थान पर, जो लोगों की नज़र में हो, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को उसकी जाति के नाम से गाली देने के लिए दंडित करती है।
शजन स्कारिया बनाम केरल राज्य (आपराधिक अपील संख्या 2622, 2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि धारा 3(1)(r) के तहत अपराध केवल इस आधार पर नहीं बनता कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है; जब तक कि उस समुदाय से संबंधित होने के कारण उसे अपमानित करने का कोई इरादा मौजूद न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि यदि आरोपों को प्रथम दृष्टया पढ़ने पर अपराध गठित करने के लिए आवश्यक तत्व सामने नहीं आते हैं तो धारा 18 की रोक लागू नहीं होगी। साथ ही कोर्ट को अग्रिम ज़मानत (Pre-Arrest Vail) देने से पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है—कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया।
कोर्ट ने केशव महतो @ केशव कुमार महतो बनाम बिहार राज्य और अन्य (SLP (Crl.) No. 12144 of 2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि धारा 3(1)(s) के तहत अपराध गठित होने के लिए यह आवश्यक है कि आरोपी किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को सार्वजनिक दृष्टि में आने वाले किसी भी स्थान पर "जाति के नाम से" गाली दे। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आरोपों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि गालियों में जाति का नाम शामिल था, या जाति के नाम का प्रयोग ही गाली के रूप में किया गया, अपमान का तत्व जाति के प्रति जानबूझकर किए गए अपमान से ही समझा जाना चाहिए।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि SC/ST Act के तहत कोई अपराध हुआ है या नहीं, यह तय करने की पहली शर्त यह है कि क्या FIR या शिकायत से पहली नज़र में (Prima Facie) ज़रूरी बातें सामने आ रही हैं। अगर पहली नज़र में पढ़ने पर ज़रूरी बातें सामने नहीं आती हैं तो धारा 18 और 18A के तहत रोक लागू नहीं होगी। कोर्ट गिरफ्तारी से पहले ज़मानत देने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने समझाया कि अगर सीधे तौर पर पढ़ने पर ज़रूरी बातें सामने आती हैं तो अग्रिम ज़मानत का उपाय उपलब्ध नहीं है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज किया कि चूंकि "चिनल" शब्द संविधान (जम्मू और कश्मीर) अनुसूचित जाति आदेश, 1956 में शामिल नहीं है, इसलिए इसे जाति का नाम नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लंबरदार और चौकीदार ने इस बात की पुष्टि की थी कि "चिनल" को स्थानीय तौर पर "मेघ" से जुड़ा एक जाति-आधारित अपमानजनक शब्द माना जाता है, जो सूची में बताई गई 13 अनुसूचित जातियों में से एक है।
कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सिर्फ़ एक शब्द का अपमान इस एक्ट के तहत अपराध नहीं हो सकता; कोर्ट ने कहा कि अगर अपराध के ज़रूरी तत्व मौजूद हैं तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि अपमान में एक शब्द है या एक से ज़्यादा।
हालांकि, कोर्ट ने 'शाजन स्कारिया' मामले में मिली अनुमति के अनुसार एक शुरुआती जांच की, जिसमें कथित घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग और याचिकाकर्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जांच की गई। कोर्ट ने पाया कि हालांकि वीडियो रिकॉर्डिंग में याचिकाकर्ता किसी पर हमला करते हुए दिख रहा था, लेकिन धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराधों के संबंध में कुछ भी ऐसा नहीं दिखा, जिससे उस पर आरोप लगाया जा सके, क्योंकि सिर्फ़ शोर-शराबा ही सुनाई दे रहा था।
कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि वीडियो रिकॉर्डिंग या प्रेस कॉन्फ्रेंस की ट्रांसक्रिप्ट में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे पहली नज़र में भी यह लगे कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) या 3(1)(s) के तहत अपराधों के ज़रूरी तत्व याचिकाकर्ता के खिलाफ़ बनते हैं। हालांकि दंड कानून के तहत दूसरे अपराध बन सकते हैं।
तदनुसार, कोर्ट ने याचिका स्वीकार की और निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ता को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे ज़मानत बांड जमा करने पर ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए।
Case Title: Santosha Devi v. UT of J&K & Ors.